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मनुष्य और पशु के आचरण पर सोचने को विवश करता हिमाचल के दो घटनाक्रम

 डी. पी. रावत 

अखण्ड भारत दर्पण न्यूज़ 



✍️ डॉ. प्रकाश आचार्य

हिमाचल प्रदेश से हाल ही में सामने आए दो अलग-अलग समाचार और दृश्य सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बने हुए हैं। इन दोनों घटनाओं को देखकर मनुष्य के व्यवहार, मानसिक संरचना और संस्कारों पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक प्रतीत होता है। यह आवश्यक नहीं कि सभी पाठक मेरे विचारों से सहमत हों, किंतु तंत्रिका विज्ञान एवं मनोविज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते इन घटनाओं पर विश्लेषण करना मैंने अपना दायित्व समझा।


पहली घटना चंबा जिले की है, जहाँ एक कुत्ता अपने मालिक की मृत्यु के बाद चार दिनों तक बर्फ के बीच भूखा-प्यासा उसके शव की रखवाली करता रहा। वहीं दूसरी ओर कांगड़ा जिले के बैजनाथ क्षेत्र के नागेहड़ गांव से एक हृदयविदारक घटना सामने आई, जहाँ 39 वर्षीय व्यक्ति ने पहले अपनी मां की बेरहमी से हत्या की और बीच-बचाव में आए 78 वर्षीय पिता को लात-घूंसे मारकर मौत के घाट उतार दिया।


यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि जो कृत्य एक मनुष्य से अपेक्षित होता है, उसे एक पशु ने कर दिखाया और जो कृत्य एक पशु से भी अपेक्षित नहीं होता, उसे एक मनुष्य ने अंजाम दिया। आखिर ऐसा क्यों?

मेरी समझ में इसका मूल कारण “तन और मन का भोजन” है।

मन का भोजन वह वातावरण है, जिसमें हम रहते हैं, जिन लोगों की संगति में रहते हैं, जो हम सुनते, देखते और ग्रहण करते हैं। वहीं तन का भोजन वह आहार और पेय पदार्थ हैं, जिन्हें हम ग्रहण करते हैं—उनकी सात्विकता, उन्हें कमाने, बनाने, परोसने और ग्रहण करने के समय का भाव।

मनोविज्ञान के अनुसार मानव मन के तीन स्तर होते हैं—

चेतन मन (Conscious Mind), अवचेतन मन (Sub-Conscious Mind) और अचेतन मन (Unconscious Mind)।

इनमें अवचेतन मन सर्वाधिक शक्तिशाली होता है। हमारी भावनाएँ चेतन मन से नियंत्रित होती हैं, किंतु अवचेतन मन को कार्य करने के लिए चेतन मन से मिलने वाले निर्देशों की आवश्यकता होती है। ये निर्देश सकारात्मक भी हो सकते हैं और नकारात्मक भी।

जब अवचेतन मन को सकारात्मक निर्देश मिलते हैं, तो उसमें उपचारात्मक मानसिक शक्ति सक्रिय होती है, जिससे प्रेम, करुणा, धैर्य, सहानुभूति, दया, कृतज्ञता, आत्म-नियंत्रण और साहस जैसे गुण विकसित होते हैं। वहीं नकारात्मक निर्देश मिलने पर विनाशकारी मानसिक शक्तियाँ सक्रिय हो जाती हैं, जिनसे क्रोध, घृणा, चिंता, तनाव, निराशा और हिंसा जैसे अवगुण उत्पन्न होते हैं।

हम देखते हैं कि आज कुत्तों को नियमित सैर कराई जाती है, स्वच्छ और सुरक्षित वातावरण में सुलाया जाता है, जांच-परख कर प्रेमपूर्वक भोजन दिया जाता है। यह कहना नहीं है कि ऐसा नहीं होना चाहिए—निश्चित रूप से होना चाहिए। क्योंकि जब किसी भी जीव को तनाव-मुक्त वातावरण और पौष्टिक, सात्विक भोजन मिलता है, तो उसकी भावनात्मक और मानसिक संवेदनाएँ सकारात्मक होती हैं, जिसका परिणाम वफादारी और प्रेम के रूप में सामने आता है।

दूसरी ओर, मनुष्य बिना यह सोचे-समझे कि भोजन कब का बना है, किस भाव से बना है, किस प्रकार के धन से अर्जित है और उसका शरीर व मन पर क्या प्रभाव पड़ेगा—ऐसा भोजन और पेय पदार्थ ग्रहण कर रहा है। साथ ही वह अनियंत्रित वातावरण और नकारात्मक संगति में जीवन यापन कर रहा है, जिसके दुष्परिणाम आज समाज में स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं।

अंत में मेरा यही कहना है कि मानव जीवन का सार इस बात में है कि वह अपनी पांच ज्ञानेंद्रियों, पांच कर्मेंद्रियों, चार अंतःकरणों, भोजन के तीन गुण—सात्विक, राजसिक और तामसिक—तथा जीवन के तीन आयाम—भार, महत्व और संस्कार—का संतुलित और सजग रूप से ध्यान रखे। यही सच्चा मानव जीवन है।

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