29 जनवरी।
डी० पी० रावत
अखण्ड भारत दर्पण (ABD) न्यूज़।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में UGC से जुड़े एक क़ानून पर रोक लगाते हुए यह अहम टिप्पणी की कि इस क़ानून का “गलत इस्तेमाल” हो सकता है और यदि किसी क़ानून का दुरुपयोग संविधान के विरुद्ध जाता है, तो उस पर रोक लगाना न्यायपालिका का अधिकार ही नहीं, बल्कि कर्तव्य है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि क़ानून की खामियों को दूर कर उसे दोबारा लाया जाना चाहिए। यह फैसला लोकतंत्र और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है।
लेकिन यहीं से एक गंभीर और असहज सवाल खड़ा होता है—
❓ UGC पर सख़्ती, मगर SIR पर नरमी क्यों?
जिस SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Review) Process) को लेकर देशभर में यह साबित हो चुका है कि उसका सबसे ज़्यादा गलत इस्तेमाल हो रहा है, उस पर सुप्रीम कोर्ट का रवैया बिल्कुल अलग क्यों है?
👉 SIR के ज़रिए करोड़ों मतदाताओं के नाम काटे जा चुके हैं
👉 राज्य दर राज्य चुनावों पर सवाल खड़े हो चुके हैं
👉 लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर किया गया है
आरोप है कि SIR के माध्यम से लोकतंत्र को धीरे-धीरे एक विशेष विचारधारा के हाथों सौंपा जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि यह प्रक्रिया मोदी-आरएसएस गैंग को लोकतंत्र पर नियंत्रण देने का औज़ार बनती जा रही है।
⚠️ सबसे भयावह पहलू
रिपोर्ट्स और सामाजिक संगठनों के अनुसार,
SIR से जुड़ी अव्यवस्थाओं, तनाव और दमन की वजह से 1000 से अधिक भारतीयों की मौत हो चुकी है।
फिर भी—
🛑 न तो इस प्रक्रिया पर पूर्ण रोक लगी
🛑 न ही इसकी संवैधानिक वैधता पर सख़्त सवाल उठे
हर बार अदालत ने कुछ मामूली संशोधनों के साथ इस प्रक्रिया को जारी रखने की अनुमति दे दी।
🗣️ जनता का सवाल साफ़ है
अगर “गलत इस्तेमाल की आशंका” UGC क़ानून को रोकने के लिए पर्याप्त है,
तो SIR जैसे खुले तौर पर लोकतंत्र-विरोधी सिस्टम पर वही कसौटी क्यों लागू नहीं होती?
✋ ABD न्यूज़ का सवाल
“UGC से ज़्यादा SIR की फिक्र है,
क्योंकि SIR समाज के हर हिस्से पर हमला है —
गरीब, मज़दूर, अल्पसंख्यक और आम मतदाता पर।”
⚖️ न्यायपालिका से उम्मीद
भारत में अदालतों के फैसले कभी उम्मीद जगाते हैं, कभी चौंकाते हैं।
लेकिन एक शिकायत आज भी ज़िंदा है—
🔴 फैसलों में न्याय की समानता क्यों नहीं?
🔴 लोकतंत्र पर खतरे के सवालों को क्यों टाला जा रहा है?
देश आज जवाब चाहता है।
क्योंकि लोकतंत्र सिर्फ़ क़ानूनों से नहीं,
बल्कि निष्पक्ष न्याय से ज़िंदा रहता है।
