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⚖️ उत्तराखंड हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: डिजिटल पत्रकारिता के लिए चेतावनी या जरूरी मर्यादा?

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17 फ़रवरी, ऑनलाइन डैस्क।डी० पी० रावत।विशेष रिपोर्ट ।

अखण्ड भारत दर्पण (ABD) न्यूज़ | 

नैनीताल से आई एक टिप्पणी ने डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में हलचल मचा दी है। न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने हिमांशु ठाकुर बनाम राज्य सरकार व अन्य (रिट याचिका (क्रिमिनल) संख्या 249/2026) की सुनवाई के दौरान साफ शब्दों में कहा—


पत्रकारिता के नाम पर की जाने वाली गतिविधियाँ तय ‘कोड ऑफ एथिक्स’ से बंधी होंगी, अन्यथा कानूनी कार्रवाई तय है।

📌 मामला क्या था?

याचिकाकर्ता द्वारा जारी एक सोशल मीडिया ‘मीडिया बाइट’ से शिकायतकर्ता की प्रतिष्ठा प्रभावित होने का दावा किया गया। अदालत को बताया गया कि वीडियो के बाद लगातार व्हाट्सएप संदेश और विभागीय कार्रवाई शुरू हो गई, जबकि मूल शिकायत वापस ली जा चुकी थी। बाद में संबंधित मीडिया बाइट हटा भी दी गई।

लेकिन सवाल केवल एक वीडियो का नहीं—पूरे डिजिटल इकोसिस्टम का है।

📜 कानून का दायरा: सिर्फ प्रिंट नहीं, डिजिटल भी जवाबदेह


अदालत के समक्ष वर्ष 2021 की अधिसूचना रखी गई, जो सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 87(2) के तहत बने नियमों से जुड़ी है।

साथ ही प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की आचार संहिता और केबल टेलीविजन नेटवर्क अधिनियम, 1995 के प्रोग्राम कोड का पालन भी अनिवार्य बताया गया।

नियम-9 (Rule 9) के तहत तीन स्तरीय व्यवस्था स्पष्ट है—

1️⃣ स्वयं नियमन

2️⃣ स्व-नियामक संस्थाएं

3️⃣ केंद्र सरकार की निगरानी

संदेश साफ है—

डिजिटल मीडिया ‘फ्री-फॉर-ऑल’ नहीं है।

🎯 बड़ा सवाल: क्या डिजिटल पत्रकारिता बेलगाम हो चुकी है?

आज सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर “मीडिया” लिख देना आसान है।

ना संपादकीय जांच, ना तथ्य सत्यापन, ना कानूनी समझ—

और परिणाम?

प्रतिष्ठा पर आघात, ट्रायल बाय सोशल मीडिया, और कभी-कभी स्थायी सामाजिक नुकसान।

लेकिन यहाँ एक संतुलन भी जरूरी है—

क्या सख्ती के नाम पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दबाव तो नहीं बढ़ेगा?

क्या सत्ता-विरोधी आवाजें भी ‘आचार संहिता’ के दायरे में दबाई जा सकती हैं?

🔍 ABD न्यूज़ की दृष्टि

अखण्ड भारत दर्पण (ABD) न्यूज़ मानता है—

✔️ पत्रकारिता स्वतंत्र हो, लेकिन तथ्यात्मक हो

✔️ आलोचना हो, लेकिन प्रमाण सहित हो

✔️ खुलासा हो, लेकिन निजी प्रतिष्ठा का हनन न हो

डिजिटल युग में “वायरल” होना ही पत्रकारिता नहीं है।

पत्रकारिता का मूल मंत्र है— सत्य, संतुलन और जिम्मेदारी।

🛑 निष्कर्ष: चेतावनी नहीं, अवसर

उत्तराखंड हाईकोर्ट की यह टिप्पणी डिजिटल पत्रकारों के लिए डर नहीं, बल्कि एक अवसर है—

अपने प्लेटफॉर्म को अधिक विश्वसनीय, प्रमाणिक और संस्थागत बनाने का।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान देता है,

लेकिन उसकी रक्षा जिम्मेदार आचरण से ही होती है।

अब सवाल यह है—

डिजिटल पत्रकारिता दिशा चुनेगी या दायित्व?

— संपादकीय टीम, अखण्ड भारत दर्पण (ABD) न्यूज़

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