10 फ़रवरी : ऑनलाइन डैस्क। डी० पी० रावत: विशेष रिपोर्ट। अखण्ड भारत दर्पण (ABD) न्यूज़
✍️ एक असहज सवाल, जो व्यवस्था की जड़ों को हिलाता है
नई दिल्ली/नागपुर | ABD न्यूज़
“जब अंग्रेज़ विदेशियों को भारत पर राज करने का अधिकार नहीं था, तो यूरेशियन ब्राह्मणों को भारत पर राज करने का अधिकार कैसे हो सकता है?”
— यह सवाल कोई सामान्य नारा नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, इतिहास और सत्ता संरचना पर सीधा प्रहार है। यह सवाल उठाया है भारत मुक्ति मोर्चा के राष्ट्रीय संयोजक मा. वामन मेश्राम ने, जो 22 फरवरी को प्रस्तावित #NagpurChalo – RSS मुख्यालय मार्च से पहले देशभर में बहस का केंद्र बन चुका है।
🧬 DNA, इतिहास और ‘आर्य’ विमर्श का राजनीतिक उपयोग
वामन मेश्राम का दावा है कि जिस तरह अंग्रेज़ों ने विदेशी होकर भारत पर शासन किया, उसी तरह एक खास वर्ग ने खुद को “आर्य” घोषित कर मूलनिवासी बहुजन समाज पर हजारों वर्षों से सत्ता, संसाधन और ज्ञान पर एकाधिकार बनाए रखा।
उनका तर्क है कि DNA रिसर्च, मानवशास्त्र और ऐतिहासिक साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि सत्ता में बैठा यह वर्ग स्वयं को भारतीय मूल का बताता है, पर व्यवहार, व्यवस्था और वर्चस्व औपनिवेशिक सोच से अलग नहीं।
🗳️ EVM, लोकतंत्र और ‘चुनावी संदेह’
भारत मुक्ति मोर्चा केवल इतिहास की बहस तक सीमित नहीं है।
#BanEVM_SaveDemocracy के नारे के साथ संगठन यह भी सवाल उठाता है कि क्या आज का लोकतंत्र वास्तव में जनता की इच्छा को प्रतिबिंबित करता है, या फिर तकनीक और संस्थाओं के ज़रिये सत्ता को नियंत्रित किया जा रहा है?
🧑🤝🧑 मूलनिवासी राष्ट्र बनाम मनुवादी राष्ट्र
मेश्राम का स्पष्ट कहना है कि भारत का असली चरित्र “मूलनिवासी राष्ट्र” का है, न कि मनुस्मृति आधारित वर्चस्ववादी ढांचे का।
उनके अनुसार शिक्षा (UGC), नौकरशाही, मीडिया और न्यायपालिका तक एक ही वैचारिक धारा का दबदबा बना हुआ है, जिससे बहुजन-आदिवासी-ओबीसी समाज आज भी हाशिये पर है।
🚩 नागपुर चलो: विरोध या वैचारिक टकराव?
22 फरवरी को नागपुर में प्रस्तावित मार्च को समर्थक “संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई” बता रहे हैं, जबकि आलोचक इसे “विभाजनकारी राजनीति” करार दे रहे हैं।
लेकिन एक सच्चाई साफ है—
👉 ये सवाल अब दबाए नहीं जा रहे
👉 इतिहास, सत्ता और पहचान पर खुली बहस सड़क से संसद तक पहुंच रही है
📰 ABD न्यूज़ का सवाल
अगर भारत ने अंग्रेज़ी हुकूमत को विदेशी कहकर खारिज किया था,
तो क्या आज सत्ता, धर्म और जाति के नाम पर किसी भी वर्चस्व को बिना सवाल स्वीकार कर लेना लोकतंत्र है?
फैसला पाठकों का है।
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