तीन दिवसीय फागली उत्सव हर्षोल्लास के साथ संपन्न, पेखड़ी गांव में उमड़ा देशभर के पर्यटकों का जमावड़ा
तीर्थन घाटी (गुशैनी-बंजार)।
हिमाचल प्रदेश की समृद्ध लोक-सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक जिला कुल्लू की तीर्थन घाटी में आयोजित प्राचीन फागली उत्सव इस वर्ष भी श्रद्धा, उल्लास और पारंपरिक रंगों के साथ संपन्न हो गया। तीन दिनों तक चले इस उत्सव में स्थानीय लोगों के साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों से आए पर्यटकों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
तीर्थन घाटी अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ प्राचीन परंपराओं और लोक संस्कृति के लिए जानी जाती है। यहां स्थित ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को और भी विशिष्ट बनाता है।
मेलों-त्योहारों से जीवंत रहती है घाटी
तीर्थन घाटी के लगभग हर गांव में वर्षभर धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन होते रहते हैं, जो सामाजिक एकता और भाईचारे को मजबूत करते हैं। फाल्गुन मास की संक्रांति के साथ घाटी के कई गांवों में फागली उत्सव मनाया जाता है। कहीं यह एक दिन का होता है, तो कहीं दो या तीन दिन तक चलता है।
इन गांवों में मनाया गया फागली उत्सव
इस वर्ष पेखड़ी, नाहीं, तिंदर, काउंचा, डिंगचा, सरची, जमाला, फरयाड़ी, कलवारी, बशीर, गरुली और श्रीकोट सहित अनेक गांवों में फागली उत्सव धूमधाम से मनाया गया।
महाराष्ट्र, पंजाब, कर्नाटक, तमिलनाडु, दिल्ली और आंध्र प्रदेश से आए सैकड़ों पर्यटकों ने मुखौटा नृत्य, पारंपरिक नाटी और धार्मिक अनुष्ठानों का आनंद लिया। कई पर्यटक इन दुर्लभ लोकनृत्यों को अपने कैमरों में कैद करते नजर आए।
मुखौटे और पारंपरिक वेशभूषा बनी पहचान
फागली उत्सव के दौरान गांवों के पुरुष सदस्य प्राचीन लकड़ी से बने मुखौटे पहनकर विशेष पारंपरिक वेशभूषा में नृत्य करते हैं। प्रत्येक गांव के मुखौटे और नृत्य शैली अलग-अलग होती है, जिससे उत्सव में विविधता और आकर्षण देखने को मिलता है। धार्मिक मान्यता है कि इस नृत्य के माध्यम से नकारात्मक शक्तियों को गांव से दूर किया जाता है।
तीन चरणों में मनाई जाती है फागली
फागली उत्सव तीन चरणों में मनाया जाता है।
पहले दिन छोटी फागली, दूसरे दिन बड़ी फागली, जिसमें मुखौटा पहने मंडयाले घर-घर जाकर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। तीसरे दिन देव पूजा और तवार के बाद गुर के माध्यम से नकारात्मक शक्तियों को गांव से बाहर भगाने की परंपरा निभाई जाती है।
पारंपरिक व्यंजनों की रही धूम
उत्सव के दौरान गांवों में पारंपरिक व्यंजन बनाए गए। विशेष रूप से ‘चिलड्डू’ का निर्माण और वितरण फागली की प्रमुख पहचान रहा। शाम के समय देवता के मैदान में सामूहिक नाटी ने उत्सव का माहौल और भी जीवंत कर दिया।
विशेषज्ञों की राय
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मंडी से जुड़े संस्कृति विशेषज्ञ प्रो. सूर्य प्रकाश ने कहा कि हिमाचल प्रदेश अपने आप में एक “लिविंग म्यूजियम” है, जहां सदियों पुरानी संस्कृति आज भी जीवंत रूप में देखने को मिलती है।
उन्होंने कहा कि हिमाचल के दूरदराज गांवों में सांस्कृतिक पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं और युवा पीढ़ी को इन क्षेत्रों को समझने व सहेजने के लिए आगे आना चाहिए।
सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन का आधार
फागली उत्सव आज केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि तीर्थन घाटी की सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन विकास का मजबूत आधार बन चुका है। यह उत्सव प्रकृति और देव आराधना के साथ-साथ सामाजिक एकता और भाईचारे का संदेश देता है।
