बंजार,6 मार्च (परस राम भारती) अखण्ड भारत दर्पण (ABD) न्यूज़।
* दिल्ली से आए पर्यटकों ने प्लास्टिक मुक्त यात्रा और पौधारोपण से दिया संदेश — विशेषज्ञ बोले, अगर जिम्मेदार पर्यटन नहीं बढ़ा तो हिमालय का संतुलन खतरे में।
हिमालय के नाजुक पर्यावरण को बचाने की जिम्मेदारी अब केवल सरकार या स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं रही, बल्कि पर्यटक भी इसमें सक्रिय भूमिका निभाने लगे हैं। कुल्लू जिले की तीर्थन घाटी में दिल्ली से आए पर्यावरण प्रेमी यात्रियों के एक समूह ने जिम्मेदार और पर्यावरण अनुकूल पर्यटन की अनोखी मिसाल पेश की।
यह घाटी ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के इको जोन में स्थित है, जो यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल है। यहां की प्राकृतिक सुंदरता और समृद्ध जैव विविधता को बचाने के लिए जिम्मेदार पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है। दिल्ली से आए इस यात्रा दल का नेतृत्व अक्षश गुप्ता, आशीष वासु, सागर और गौरव ने किया। लगभग 20 सदस्यों के इस समूह ने तीर्थन घाटी में स्थित सनशाइन हिमालयन कॉटेज में प्रवास किया, जिसे पारंपरिक काठकुनी शैली में स्थानीय लकड़ी और पत्थर से बनाया गया है। यह कॉटेज पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ पहाड़ों की पारंपरिक वास्तुकला को भी जीवित रखने का उदाहरण है। यात्रा के दौरान इस समूह ने पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। पर्यटकों ने पैकेज्ड कोल्ड ड्रिंक और बोतलबंद पानी का उपयोग करने से परहेज किया और स्थानीय हिमालयी पेय पदार्थों को अपनाया, जिससे प्लास्टिक कचरे को बनने से रोका जा सके।
इसके साथ ही यात्रियों ने स्थानीय सुरक्षित पानी का उपयोग किया और अपने साथ निजी उपयोग का सामान जैसे टूथब्रश और अन्य आवश्यक वस्तुएं लेकर आए, ताकि अनावश्यक कचरा उत्पन्न न हो। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक और पहल करते हुए समूह के सदस्यों ने घाटी में पौधारोपण भी किया और स्थानीय लोगों तथा पर्यटकों को जलवायु जिम्मेदारी और प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया।
सनशाइन हिमालयन कॉटेज के मालिक और पर्यावरण कार्यकर्ता पंकी सूद का कहना है कि पर्यटन के लगातार बढ़ते दबाव के कारण मनाली, शिमला और तीर्थन घाटी जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में प्लास्टिक कचरे की समस्या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में जिम्मेदार पर्यटन की पहल बेहद जरूरी हो गई है। उन्होंने बताया कि उनके कॉटेज में ठहरने वाले उन मेहमानों को “ग्रीन क्रेडिट्स” दिए जाते हैं, जो प्लास्टिक कचरा नहीं बनाते और पर्यावरण के अनुकूल व्यवहार अपनाते हैं। इससे पर्यटक भी प्रकृति के प्रति अधिक जिम्मेदार बनने के लिए प्रेरित होते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कुछ समूहों की पहल से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी। यदि पर्यटन को नियंत्रित और पर्यावरण के अनुकूल नहीं बनाया गया, तो हिमालय का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र गंभीर संकट में पड़ सकता है। फिलहाल तीर्थन घाटी में पर्यटकों द्वारा उठाए गए ये छोटे-छोटे कदम यह संदेश जरूर देते हैं कि अब कई लोग केवल घूमने के लिए नहीं, बल्कि प्रकृति को बचाने की जिम्मेदारी निभाने भी हिमालय की ओर आ रहे हैं।
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