पूर्ण चंद कौशल, ब्यूरो हिमाचल।
हिमाचल प्रदेश में सड़क निर्माण के लिए वन विभाग की क्लीयरेंस करवाना बेहद पेचीदा है। वहीं, विपरीत भौगोलिक स्थिति के चलते राज्य में डंपिंग साइट्स की भी दिक्कत हो रही है। समय पर क्लीयरेंस न मिलने के कारण परियोजनाओं के निर्माण में देरी भी हो रही है। मनाली विधानसभा के बड़ागढ़ में केंद्रीय मंत्री सेवानिवृत्त जनरल वीके सिंह की अध्यक्षता में आयोजित समीक्षा बैठक में यह खुलासा हुआ।
बैठक के दौरान अधिकारियों ने कहा कि हिमाचल में वन विभाग की क्लीयरेंस टेढ़ी खीर है। इस दौरान जानकारी दी गई कि राज्य में 8520 करोड़ रुपए की चार बड़ी टू-लेन तथा फोरलेन परियोजना बनाई जानी हैं, जिनकी निविदाएं अभी आमंत्रित की जानी हैं। क्षेत्रीय कार्यालय शिमला के अंतर्गत 909 करोड़ रुपए की 175 किलोमीटर लंबी इन सड़क परियोजनाओं के कार्य किए जाएंगे। 192 किलोमीटर परवाणू-शिमला, 236 किलोमीटर कीरतपुर-मंडी-कुल्लू-मनाली, शिमला से मटौर के कार्य का अवार्ड कर दिया गया है। पिंजौर-बद्दी-नालागढ़ कॉरिडोर तथा पठानकोट से मंडी के कार्य अभी अवार्ड किए जाने हैं। इन सड़कों के फोरलेन अथवा टू-लेन बन जाने से 132 किलोमीटर की लंबाई कम होगी। भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण मुख्यालय के क्षेत्रीय अधिकारी अब्दुल बासित ने बैठक में बताया कि उनके पास 786 किलोमीटर लंबी सड़क परियोजनाओं के निर्माण का कार्य है। इस साल आठ सड़क परियोजनाओं के अवार्ड करने का लक्ष्य है। इनमें से चार की निविदाएं आमंत्रित कर दी गई हैं। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यहां पर डंपिंग साइट की
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