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आपदा की छाया में भी जीवित रही परंपरा: तीर्थन घाटी में सादगी से मनाया गया वन्य प्राणी सप्ताह

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ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क प्रबंधन द्वारा हर वर्ष की भांति इस बार भी तीर्थन रेंज शाईरोपा कम्पलेक्स में वन्य प्राणी सप्ताह और महिला मेले का आयोजन किया गया। हालांकि हाल ही में आई प्राकृतिक आपदा और सड़कों के बाधित रहने से इस बार कार्यक्रम सादगी और सीमित स्वरूप में ही आयोजित किया गया।


महिला समूहों और बच्चों ने दिखाया उत्साह


जहाँ पिछले वर्षों में इस आयोजन में भारी भीड़ उमड़ती थी और महिलाओं की नाटी प्रतियोगिता आकर्षण का केंद्र होती थी, वहीं इस बार आयोजन में केवल स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूहों और स्कूली बच्चों की भागीदारी रही। भाषण प्रतियोगिता, समूह अनुभव साझा करना और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के जरिए प्रतिभागियों ने पर्यावरण संरक्षण, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, स्वच्छता और वन्य जीव संरक्षण जैसे संदेश समाज तक पहुँचाए।



महिला भाषण प्रतियोगिता में पांच बीर स्वयं सहायता समूह बरनागी की रंजना देवी प्रथम, नारी शक्ति स्वयं सहायता समूह जावल की विद्या देवी द्वितीय और नाग स्वयं सहायता समूह परवाडी की नारा देवी तृतीय रहीं।


कान्हा डांस अकेडमी ने बिखेरा रंग


कार्यक्रम में कान्हा डांस अकेडमी बंजार के कलाकारों ने अपनी शानदार प्रस्तुतियों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया और खूब तालियां बटोरीं।


मुख्य अतिथि ने दिया संरक्षण का संदेश


इस अवसर पर ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क के वन मंडल अधिकारी सचिन शर्मा मुख्य अतिथि रहे। उन्होंने प्रतिभागियों को सम्मानित करते हुए कहा कि वन्य जीवों के संरक्षण और पर्यावरण संतुलन के लिए स्थानीय समुदाय की भागीदारी बेहद अहम है। उन्होंने महिलाओं और बच्चों के उत्साह की सराहना करते हुए कहा कि यह आयोजन अब तीर्थन घाटी की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है।


उन्होंने बताया कि 2 से 8 अक्टूबर तक हर साल वन्य प्राणी सप्ताह मनाया जाता है, लेकिन इस बार दशहरा और प्राकृतिक आपदा के कारण कार्यक्रम को सूक्ष्म स्तर पर रखा गया है। 9 अक्टूबर को इसका समापन सैंज रोपा में होगा।


प्रकृति हमारी पहचान, वन्यजीव हमारी धरोहर”


इस बार वन्य प्राणी सप्ताह का थीम मानव और वन्यजीव सहअस्तित्व रखा गया। सचिन शर्मा ने कहा कि हिमाचल की घाटियाँ और जंगल सदियों से मनुष्य और वन्यजीवों का घर रहे हैं। इनका संरक्षण हर किसी की जिम्मेदारी है।


हालांकि इस बार आयोजन छोटा रहा, लेकिन महिलाओं और बच्चों का उत्साह देखते ही बनता था। पर्यटकों ने भी इस सादगीपूर्ण मेले का आनंद उठाया और इसे हिमाचल की परंपरा व संस्कृति को जीवित रखने का सराहनीय प्रयास बताया।

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