11 अप्रैल,आनी, हिमाचल प्रदेश।
डी० पी० रावत: विशेष रिपोर्ट।
सनातन धर्म में देवी-देवता हमारी आस्था और संस्कृति का मूल आधार हैं। मंदिर केवल ईश्वर की उपासना का केंद्र नहीं, बल्कि यह श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक भी हैं। आनी क्षेत्र में हाल ही में खेगसू गाँव में स्थित कुसुम्बा माता का प्राचीन मंदिर खेगसू,तहसील आनी ज़िला कुल्लू हिमाचल प्रदेश में चर्चा में है। इस अवसर पर व्यास आचार्य डॉ. दया नंद गौतम और राष्ट्रोदय संगठन के सह प्रमुख व प्रांत प्रभारी हिमाचल प्रदेश, भाजपा समर्थक मंच के प्रदेश अध्यक्ष अमर नयन शर्मा ने अन्य गणमान्य व्यक्तियों के साथ माता के मंदिर में शीश नवाकर आशीर्वाद प्राप्त किया।
🕉️ मंदिर की पौराणिक कथा:
त्रेतायुग की बात है, जब दो विद्वान ब्राह्मण, ओवडू और शोवडू, अपनी तांत्रिक विद्या और घुमक्कड़ी के लिए हिमाचल प्रदेश की ओर आए। वे शिमला जिले के कुमारसैन रियासत के कचेडी गाँव में एक घने और सुरमई जंगल में विश्राम करने गए। लेकिन सुबह उठकर उन्होंने पाया कि वे श्मशान घाट में हैं। यह रहस्य उन्हें बहुत विचलित कर गया।
जिज्ञासा बढ़ने पर उन्होंने अपनी तांत्रिक विद्या का प्रयोग किया और यह पता चला कि वहां दैविक शक्तियां विद्यमान हैं। खुदाई करने पर तीन पिंडियाँ मिलीं। दो पिंडियाँ तुंबे में बंद हो गईं, जबकि तीसरी गायब हो गई। आगे यात्रा में, पिंडियाँ हवा के रूप में मुक्त हो गईं। एक पिंडी शरम्बल कैंप के नीचे दिव्य रूप में विराजमान हुई, जिसे आज कोटेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।
दूसरी पिंडी खेगसू में पहुँची, और काली घटा और बिजली के साथ प्रकट हुई। इसे देख कर गाँव के लोग स्तब्ध रह गए। कन्या ने इशारों में कहा कि वह कचेढ़ी माता की छोटी बहन कुसुम्बा माता है। माता ने मंदिर निर्माण और सतलुज नदी के जल से पूजा की शर्त रखी। उन्होंने आश्वासन दिया कि भक्तों की मनोकामनाएँ पूरी होंगी और धन-वैभव की कोई कमी नहीं होगी।
🌟 माता का विशेष रूप:
कुसुम्बा माता उग्र और शांत स्वभाव दोनों में निपुण हैं। वे एकान्तवास वाली हैं और भक्तों की स्मरण मात्र से मनोकामनाएँ पूरी कर देती हैं। यदि क्रोधित हों, तो सर्वनाश भी कर सकती हैं।
🛕 भगवान परशुराम का खेगसू आगमन:
भगवान परशुराम, विष्णु के छठे अवतार, सतयुग और त्रेतायुग के संधिकाल में खेगसू आए। मान्यता है कि उन्होंने काली माता की स्थापना की और इसे ‘काली खैई’ कहा। परशुराम ने मंदिर के पास वृक्ष के नीचे विश्राम किया, जिसकी पूजा आज भी की जाती है।
हिमाचल की लोककथाओं में कहा जाता है कि परशुराम ने पाँच विशेष ब्राह्मण गाँवों को बसाया:
- निरमंड: “हिमालय की काशी” कहा जाता है, यहाँ ब्राह्मणों का वंश आज भी है।
- दत्तानगर: प्राचीन ब्राह्मणवादी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध।
- नीरथ: अनूठे लोक अनुष्ठानों का स्थल।
- काव: कृषि और सांस्कृतिक समृद्धि की भूमि।
- मामेल: परशुराम पूजा से जुड़ा हुआ, स्थानीय मंदिर आज भी हैं।
इसके अलावा, परशुराम ने चार दिशाओं से ब्राह्मणों को आमंत्रित किया और उन्हें शनेरी, डँसा, लालसा, शिंगला और खेगसू में बसाया। इसे सामूहिक रूप से परशुराम ठहरियां (Parashurama Thahriyan) कहा गया।
💰 माता के भक्तों की अपील:
माता के भक्त अमर नयन शर्मा और धर्मेन्द्र शर्मा ने नये मंदिर निर्माण के लिए क्षेत्रवासियों और भक्तों से आर्थिक सहयोग की अपील की है। उनका कहना है कि सभी का योगदान माता की सेवा और स्थानीय संस्कृति को सुदृढ़ बनाएगा।
🌿 इतिहास और संस्कृति:
खेगसू क्षेत्र का इतिहास और परशुराम से जुड़ी मान्यताएँ इसे धर्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती हैं। रामपुर बुशहर का लवी मेला पहले खेगसू में आयोजित होता था। विनाश और समझौते के कारण यह मेला रामपुर में आयोजित होने लगा। इस मेले में तिब्बत और बुशहर के राजा एक-दूसरे को तलवार और टोपी भेंट करते थे।
🙏 निष्कर्ष:
खेगसू में कुसुम्बा माता का मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि यह त्रेतायुग और सतयुग से जुड़ी दैविक ऊर्जा, लोककथाएँ और धार्मिक इतिहास का प्रतीक है। माता के भक्तों के प्रयास और सहयोग से यह मंदिर भविष्य में एक प्रमुख धार्मिक स्थल बन सकता है।


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