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    Sunday, March 29, 2026

    ✍️ सम्पादकीय: “लोकतंत्र पर लॉकडाउन? हिमाचल में पंचायत चुनाव पर सरकार, कोर्ट और आयोग आमने-सामने!”

     


    📌आपदा का बहाना या सत्ता का खेल? सुप्रीम कोर्ट की डेडलाइन, हाई कोर्ट की रोक और चुनाव आयोग की उलझन—गांव की सरकार फिर अधर में

     डी० पी० रावत: सम्पादक| 

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    हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव को लेकर जिस तरह का संवैधानिक टकराव सामने आया है, वह न केवल प्रशासनिक असफलता का संकेत है, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे की जड़ों को भी हिलाने वाला है। सरकार, न्यायपालिका और चुनाव आयोग के बीच बढ़ती खींचतान ने एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या गांव की सरकार अब केवल कागज़ों में ही रह जाएगी?

    पंचायती राज संस्थाओं का कार्यकाल 31 जनवरी को समाप्त हो चुका है। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार, चुनाव समय पर कराना अनिवार्य होता है ताकि स्थानीय स्वशासन की निरंतरता बनी रहे। लेकिन हिमाचल में यह प्रक्रिया समय से पहले पूरी नहीं हो सकी। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण बना राज्य सरकार का “आपदा प्रबंधन अधिनियम” का हवाला, जिसके आधार पर चुनाव टालने का प्रयास किया गया।

    यह मामला अंततः देश की सर्वोच्च अदालत—Supreme Court of India—तक पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश देते हुए 31 मई से पहले पंचायत चुनाव सम्पन्न कराने का आदेश दिया। यह आदेश न केवल कानूनी बाध्यता है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का एक मजबूत संदेश भी है।

    हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम में एक और महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय (Himachal Pradesh High Court) ने राज्य सरकार द्वारा किए जा रहे पंचायतों के पुनर्सीमांकन और गठन के फैसलों पर अंतरिम रोक लगा दी। हाई कोर्ट के इस निर्णय ने चुनावी प्रक्रिया को और जटिल बना दिया।

    यहां सवाल उठता है—क्या सरकार ने पुनर्सीमांकन का फैसला समय रहते नहीं लिया? या फिर यह एक सोची-समझी रणनीति थी जिससे चुनावों को टाला जा सके?

    इसी बीच हिमाचल प्रदेश राज्य चुनाव आयोग  (Himachal Pradesh State Election Commission) ने चुनाव प्रक्रिया शुरू करने के लिए प्रारंभिक अधिसूचना जारी कर दी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश और कानूनी अस्पष्टता के कारण वह अधिसूचना प्रभावहीन मानी गई। इससे चुनाव आयोग की स्थिति भी असमंजसपूर्ण हो गई है—एक तरफ अदालत का दबाव, दूसरी तरफ सरकार की अधूरी तैयारियां।

    सबसे बड़ी प्रशासनिक विफलता सरकार की ओर से रोस्टर जारी न कर पाना है। पंचायत चुनावों में आरक्षण रोस्टर अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इसके बिना चुनावी प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकती। यह देरी केवल तकनीकी नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को भी दर्शाती है।

    मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू (Sukhvinder Singh Sukhu) के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार पर अब सवालों की बौछार हो रही है। विपक्ष इसे लोकतंत्र की हत्या करार दे रहा है, जबकि सरकार अपनी मजबूरियों का हवाला दे रही है।

    लेकिन सच्चाई यह है कि इस पूरे टकराव का सबसे बड़ा नुकसान आम जनता और ग्रामीण विकास को हो रहा है। पंचायतें गांवों के विकास की रीढ़ होती हैं—सड़क, पानी, स्वच्छता, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतें इन्हीं संस्थाओं के माध्यम से पूरी होती हैं। जब पंचायतें ही अस्तित्व में नहीं होंगी, तो विकास की गति स्वतः ही रुक जाएगी।

    यह स्थिति केवल प्रशासनिक संकट नहीं, बल्कि संवैधानिक संकट का रूप लेती जा रही है। भारत का संविधान स्थानीय स्वशासन को मजबूत करने पर जोर देता है। 73वें संविधान संशोधन के तहत पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया गया था, ताकि लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक पहुंचाया जा सके। लेकिन हिमाचल में जो हो रहा है, वह इस भावना के बिल्कुल विपरीत है।

    तीनों संस्थाओं—सरकार, न्यायपालिका और चुनाव आयोग—के बीच समन्वय का अभाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। जहां सरकार समय पर निर्णय लेने में विफल रही, वहीं अदालतों के अलग-अलग आदेशों ने स्थिति को और उलझा दिया। चुनाव आयोग, जो एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है, वह भी इस टकराव के बीच फंसा नजर आ रहा है।

    अब सबसे बड़ा सवाल यह है—क्या 31 मई की डेडलाइन के भीतर चुनाव संभव हो पाएंगे?

    यदि सरकार जल्द से जल्द रोस्टर जारी नहीं करती और कानूनी अड़चनों को दूर नहीं किया जाता, तो सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है।

    इस पूरे घटनाक्रम से एक महत्वपूर्ण सीख मिलती है—लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि समयबद्ध और पारदर्शी प्रक्रिया से चलता है। जब संस्थाएं अपने-अपने दायरे में रहकर काम नहीं करतीं, तो टकराव अवश्यंभावी हो जाता है।

    अखण्ड भारत दर्पण का यह स्पष्ट मानना है कि इस संकट से निकलने का एकमात्र रास्ता है—संवाद और समन्वय।

    सरकार को चाहिए कि वह जल्द से जल्द रोस्टर जारी करे, पुनर्सीमांकन से जुड़े विवादों का समाधान निकाले और चुनाव आयोग को स्वतंत्र रूप से कार्य करने दे।

    न्यायपालिका को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि उसके आदेश स्पष्ट और व्यावहारिक हों, ताकि प्रशासनिक स्तर पर कोई भ्रम न रहे।

    अंततः, यह याद रखना जरूरी है कि लोकतंत्र की असली ताकत गांवों में बसती है। यदि पंचायतें कमजोर होंगी, तो पूरा लोकतांत्रिक ढांचा कमजोर हो जाएगा।

    📢 निष्कर्ष:

    हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनाव को लेकर जारी यह टकराव एक चेतावनी है—यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया, तो यह केवल एक प्रशासनिक विवाद नहीं रहेगा, बल्कि लोकतंत्र के मूल ढांचे पर गहरा आघात बन जाएगा।

    गांव की सरकार को अधर में लटकाना, दरअसल जनता की आवाज को दबाने जैसा है—और लोकतंत्र में इससे बड़ा अपराध कोई नहीं।