हिमाचल प्रदेश में अब उन आयुर्वेदिक डिस्पेंसरियों की बंद होने की तैयारी है, जहां मरीजों की आमद नाममात्र रह गई है। सरकार ने प्रदेश भर की आयुर्वेदिक डिस्पेंसरियों की तीन साल की ओपीडी रिपोर्ट खंगाली और पाया कि करीब 30 डिस्पेंसरियों में महीने भर में 100 से भी कम मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में इन संस्थानों को बंद करने और युक्तिकरण की दिशा में कदम उठाया गया है।
सूत्रों के अनुसार, कई डिस्पेंसरियों में न तो भवन हैं और न ही नियमित डॉक्टर या स्टाफ मौजूद है। कुछ स्थानों पर तो पिछले कई महीनों से ओपीडी शून्य या बेहद कम रही है। संचालन लागत और संसाधनों के नुकसान को देखते हुए अब सरकार ने इनका युक्तिकरण कर बेहतर क्षेत्रों में सेवाएं केंद्रित करने का निर्णय लिया है।
असर: ग्रामीणों को झेलनी पड़ेगी दिक्कत, लेकिन सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ेगी
हालांकि इस कदम से उन ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को परेशानी जरूर होगी, जहां पास में कोई और आयुर्वेदिक केंद्र नहीं है। उन्हें अब आयुर्वेदिक उपचार के लिए कुछ दूरी तय करनी पड़ेगी। लेकिन विभागीय अधिकारियों का कहना है कि यह कदम दीर्घकालिक दृष्टिकोण से जरूरी है, ताकि स्वास्थ्य संसाधनों का कुशल उपयोग हो सके।
जहां मरीज ज्यादा, वहां मिलेंगी ज्यादा सुविधाएं
सरकार ने यह भी तय किया है कि जिन क्षेत्रों में आयुर्वेदिक डिस्पेंसरियों में ओपीडी अच्छी है, वहां सुविधाएं बढ़ाई जाएंगी। डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्य कर्मियों को वहीं स्थानांतरित किया जाएगा, जहां उनकी जरूरत ज्यादा है। इससे न केवल मरीजों को लाभ मिलेगा, बल्कि विभाग की कार्यकुशलता भी बढ़ेगी।
सरकार का तर्क: संसाधनों का हो बेहतर इस्तेमाल
स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि बंद की जा रही डिस्पेंसरियां न तो अपनी लागत निकाल पा रही थीं और न ही वहां से कोई ठोस स्वास्थ्य लाभ मिल रहा था। ऐसे में इन संस्थानों को चलाना संसाधनों की बर्बादी जैसा था। युक्तिकरण से न केवल सेवाएं सुदृढ़ होंगी, बल्कि कर्मचारियों का सदुपयोग भी हो सकेगा।
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