क्या जैन, बौद्ध और सिख हिंदू धर्म के अंग हैं? संविधान के अनुच्छेद-25 का प्रश्न अमृतपाल सिंह ने क्यों उठाया?
असम की जेल में बंद अलगाववादी नेता अमृतपाल सिंह ने पंजाब की खडूर साहिब सीट से लोकसभा चुनाव जीता है, लेकिन अभी शपथ नहीं ली है। हालाँकि, अमृतपाल सिंह का एक पुराना इंटरव्यू बहुत वायरल हो रहा है। इसमें उन्होंने कहा कि उन्हें संविधान के अनुच्छेद 25 से मतभेद है। इसमें ज्ञान की मान्यता नहीं है।
इसके बावजूद, ऐसा नहीं है। संविधान के अनुच्छेद-25 में धार्मिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है। ऐसे बयान लोग अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए करते हैं। अनुच्छेद 25 में बताया गया है कि क्या कहता है।
अनुच्छेद-25 क्या कहता है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लेख करता है। इससे कुछ समुदायों में भ्रम है कि संविधान में सिख, जैन और बौद्ध धर्म मानने वालों को हिंदुओं के अंतर्गत रखा गया है। वास्तव में, इस अनुच्छेद के अनुसार, प्रत्येक नागरिक को अपनी मनपसंद धर्म का प्रचार और अभ्यास करने का स्वतंत्र अधिकार है। इसके अलावा, यह अनुच्छेद सभी को अपने धर्म का प्रचार करने का अधिकार भी देता है, सरकार के हस्तक्षेप के डर के बिना। इसमें राज्य, यानी शासन, से अनुरोध किया गया है कि वह इस अनुच्छेद को अपने अधिकार क्षेत्र में लागू करे।
राज्य को वित्तीय, आर्थिक, राजनीतिक या किसी भी अन्य धर्मनिरपेक्ष गतिविधि पर नियंत्रण या प्रतिबंध लगाने का अधिकार इस अनुच्छेद में दिया गया है। यह भी सामाजिक सुधार या सुधार या सार्वजनिक हिंदू धार्मिक संस्थाओं को हिंदुओं के अलावा सभी वर्गों के लिए खोलने का प्रबंध करता है।अनुच्छेद 25 में दी गई शर्तों के तहत ही हिंदुओं, जैनियों और बौद्धों को शामिल किया गया है। इसमें कहा गया है कि कृपाण धारण करने और लेने वालों को सिख धर्म में शामिल माना जाएगा।
1950 में, देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि संविधान केवल अनुच्छेद में प्रावधान के लिए एक नियम बनाता है। जैसा कि आप देखेंगे, इसमें बौद्ध, सिख और जैन धर्म का भी उल्लेख है। यह स्पष्ट है कि बौद्धों को हिंदू नहीं मानना चाहिए। इसलिए जैनियों को हिंदू मानने का कोई कारण नहीं है। वास्तव में, जैन कुछ मायनों में हिंदुओं की तरह हैं और उनके कई रीति-रिवाज लगभग समान हैं। इसके बावजूद, इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे एक विशिष्ट धार्मिक समुदाय हैं, और संविधान किसी भी तरह से इस मान्यता प्राप्त स्थिति को प्रभावित नहीं करता है।
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट विनीत जिंदल ने कहा कि अमृतपाल सिंह ने कहा कि सिखों का हिंदू धर्म से कोई नाता नहीं है और वे अलग हैं। यह प्रोपैगंडा बहुत समय से फैल रहा है। साथ ही, अमृतपाल सिंह ने कहा कि अनुच्छेद 25 में सिखों का उल्लेख नहीं है और सिखों को हिंदुओं की एक शाखा माना जाता है। उनका दावा गलत है।
सिख विरोधी नहीं है ये बिल। जैसा कि लेखक एडवोकेट जिंदल ने कहा, मैं यहाँ सिखों के पहले गुरु गुरु नानकदेव जी का जिक्र करना चाहूंगा, जिनके हाथ में हमेशा रुद्राक्ष की माला थी और वह हरिनाम का जाप करते थे। जब सिखों के पहले शिक्षक हिंदू धर्म की व्यवस्था को मानते थे। हिंदुओं के भगवानों और देवियों की पूजा करने के लिए भी नौ गुरु थे। यह साबित करता है कि सिख सिर्फ हिंदुओं की एक शाखा है।
एडवोकेट जिंदल ने कहा कि अमृतपाल जैसे लोग अब भारत के संविधान और कानून की बात करके सिर्फ लोगों को भड़काना चाहते हैं, जिससे उनकी खालिस्तान की मांग बढ़ जाए। मैं किसी भी तरह से सिखने पर कोई पाबंदी नहीं देखता। उनकी जो भी मान्यताएं हैं, उनका प्रचार कर सकते हैं। भारतीय संविधान की शिक्षाएं या आर्टिकल 25 किसी भी तरह से विरोधी नहीं हैं।
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