इसके अलावा बोर्ड में पिछले 15 वर्षों से आउटसोर्सिंग आधार पर काम कर रहे 175 कर्मचारियों को बोर्ड में मर्ज करने की मांग रखी तथा पुराने कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि करने की मांग उठाई है।इसके अलावा बोर्ड में पिछले पांच साल में प्रचार प्रसार और विज्ञापनों पर ख़र्च की गई करोड़ो रूपये की राशि की जांच करने की भी मांग की गई।भविष्य में बोर्ड का पैसा मज़दूरों के कल्याण पर ज़्यादा ख़र्च करने तथा स्कीमों की जानकारी ग्राम पंचायतों और पंजीकृत मज़दूर यूनियनों के माध्यम से देने का भी फैसला लिया गया।भूपेंद्र सिंह ने चेतावनी दी है कि इन सब सुझावों को जल्दी लागू नहीं किया तो सीटू से सबंधित मनरेगा व निर्माण यूनियन शिमला में प्रदर्शन करेगा।उन्होंने ये कहा कि वे इस बारे दूसरे मज़दूर संगठनों को भी इस बारे तालमेल करेंगे और सहमति बनती है तो सयुंक्त रूप में भी आंदोलन छेड़ा जायेगा। भूपेंद्र सिंह ने कहा कि बोर्ड में अफ़सरशाही हावी है और वे भवन एवं अन्य सनिर्माण कामगार क़ानून 1996 के प्रावधानों को अपनी मर्ज़ी से तोड़ मरोड़ रहे हैं और सरकार को ग़ुमराह कर रहे हैं।
पिछले कल जब मज़दूर संगठनों ने इस पर तर्क पेश किए तो उन्होंने फ़ैसले को लटकाने के लिए मामले को लॉ विभाग को भेजने का पेच जानबूझकर फंसा दिया जबकि इन्ही अफसरों ने गत सितंबर महीने से बिना बोर्ड और सरकार की सहमति से सारा काम रोक दिया है।उन्होंने बताया कि यदि इनका रवैया ऐसे ही मज़दूर विरोधी और मनमानी वाला रहा तो सभी मज़दूर संगठन मई माह में बोर्ड कार्यालय का शिमला में घेराव करेंगे।
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