“अनपढ़, बीमार और अक्षम कृषक के नाम पर back-dated दस्तावेज़, गायब रास्ता और नियमों की खुली धज्जियाँ – राजस्थान राजस्व विभाग में हुआ बड़ा फर्जीवाड़ा!”
10अप्रैल,बालोतरा, राजस्थान।
ABD NEWS के राज्य ब्यूरो (असरफ मारोठी) की रिपोर्ट:
बालोतरा जिले की पचपदरा तहसील में सन् 2007 में हुए एक अजीबोगरीब भूमि संपरिवर्तन मामले ने प्रशासनिक गड़बड़ी और फर्जीवाड़े के नए पहलू उजागर कर दिए हैं। इस मामले में न केवल नियमों की अनदेखी हुई, बल्कि एक गंभीर रूप से बीमार और चलने-फिरने में अक्षम एसटी कृषक के नाम पर दस्तावेज़ तैयार किए गए, जिनमें उसके अंगूठे के निशान तक का सत्यापन नहीं था।
मामला मंडापुरा ग्राम की एसटी कृषि भूमि का है। भूमि संपरिवर्तन आवेदन की पत्रावली का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि आवेदन आधिकारिक रूप से दर्ज होने से 9 महीने पहले ही पटवारी ने जांच रिपोर्ट पेश कर दी थी। यह “जादू” या “चमत्कार” नहीं, बल्कि प्रशासनिक मिलीभगत और पद के दुरुपयोग का सबसे बड़ा उदाहरण माना जा रहा है।
📌 पत्रावली में तारीखों का मायाजाल:
- 29 अक्टूबर 2006: विहित प्राधिकारी ने पहली बार आवेदन पर 'राजस्व' मार्क किया।
- 17 जनवरी 2006: पटवारी ने अपनी जांच रिपोर्ट पेश कर दी – यानी आवेदन मिलने से 9 महीने पहले।
- 23 दिसंबर 2006: जमाबंदी का प्रमाण पत्र उपयोग किया गया, जबकि यह खुद 11 महीने पहले लिखा गया था।
- 5 अगस्त 2006: संपूर्ण चालान जमा किया गया, जबकि विभागीय कार्यवाही बाद में शुरू हुई।
यह सभी विवरण राजस्व विभाग के नियमों और प्रक्रियाओं के विपरीत हैं, जिससे यह मामला सीधे फर्जीवाड़े की श्रेणी में आता है।
💔 अक्षम आवेदक और अप्रमाणित अंगूठा:
आवेदक अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग का एक व्यक्ति था, जो गंभीर बीमारी के कारण पूरी तरह अक्षम था। नियमों के अनुसार ऐसे मामले में दो गवाहों या राजपत्रित अधिकारी द्वारा अंगूठे के निशान का सत्यापन अनिवार्य है, लेकिन पत्रावली में न तो अंगूठा प्रमाणित है और न ही आवेदन की वास्तविक दिनांक दर्ज।
🚧 रास्ता गायब, भूमि ‘लैंडलॉक’:
तकनीकी रूप से भी यह संपरिवर्तन अवैध प्रतीत होता है। भू-संपरिवर्तन नियमावली 1992 के अनुसार, आवासीय घोषित भूमि तक सड़क/रास्ता होना अनिवार्य है। मगर, संपरिवर्तित भूमि के पास कोई रास्ता नहीं दिखाया गया। इसके कारण कृषक की अन्य कृषि भूमि मुख्य सड़क से जुड़ी हुई थी, जबकि संपरिवर्तित भूमि पूरी तरह से बंद (लैंडलॉक) थी।
❓ सवालों के घेरे में विभाग:
- बिना दिनांक और बिना सत्यापन वाले आवेदन को कैसे स्वीकार किया गया?
- क्या राजस्व अधिकारियों ने बीमार आवेदक का बयान लिया?
- आवेदन दर्ज होने से पहले ही पटवारी रिपोर्ट और चालान कैसे तैयार हुए?
- रास्ते के अभाव में संपरिवर्तन की अनुमति किसने और क्यों दी?
📝 विशेष विवरण:
- आवेदन प्रस्तुत होने से 85 दिन पहले संपूर्ण संपरिवर्तन शुल्क चालान जमा किया गया।
- पटवारी जांच रिपोर्ट दिनांक 17/01/2006, जबकि आवेदन 29/10/2006 को ही मार्क किया गया।
- नक्शे में बगैर रास्ता भूमि संपरिवर्तन दिखाया गया।
इस पूरे घटनाक्रम ने 2006-07 के दौरान हुए भूमि संपरिवर्तन पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। जानकारों का कहना है कि यह सीधा-सीधा धोखाधड़ी और पद के दुरुपयोग का मामला है।
👨👩👦 पीड़ित परिवार की गुहार:
दिवंगत एसटी कृषक के परिजनों ने करीब 5 महीने पहले जिला कलेक्टर के समक्ष इस मामले में संपूर्ण जांच की गुहार लगाई थी। कलेक्टर ने तहसीलदार पचपदरा को जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए, परंतु अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।
⚖️ संभावित उच्चस्तरीय जांच:
यदि उच्चस्तरीय जांच होती है, तो कई बड़े अधिकारी और कथित भूमि क्रेता भी बेनकाब हो सकते हैं। इस घोटाले ने न केवल राजस्व विभाग की विश्वसनीयता को चुनौती दी है, बल्कि गरीब और अक्षम वर्ग के साथ हुए अन्याय को भी उजागर किया है।
📢 ABD NEWS की रिपोर्ट के अनुसार, यह मामला प्रशासनिक चतुराई और फर्जीवाड़े का एक उदाहरण बन गया है। राजस्थान के राजस्व विभाग को इस मामले की तुरंत और पारदर्शी जांच करनी होगी, ताकि भविष्य में ऐसी धोखाधड़ी रोकी जा सके।
💡 समापन विचार:
बालोतरा का यह मामला दिखाता है कि नियमों की अवहेलना और प्रशासनिक मिलीभगत कैसे आम नागरिकों के अधिकारों के साथ खिलवाड़ करती है। यदि सही कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले समय में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ सकती है।








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