“गांव की रसोई से ग्लोबल ब्रांड तक: PMFME स्कीम बना रही ‘लोकल को वोकल’—क्या आप तैयार हैं अपना फूड बिजनेस शुरू करने के लिए?” - अखण्ड भारत दर्पण (ABD) न्यूज़

अखण्ड भारत दर्पण (ABD)  न्यूज़

ABD News पर पढ़ें राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय, प्रदेश और स्थानीय समाचार। राजनीति, शिक्षा, खेल और ताज़ा खबरें।


Breaking News

    Friday, March 20, 2026

    “गांव की रसोई से ग्लोबल ब्रांड तक: PMFME स्कीम बना रही ‘लोकल को वोकल’—क्या आप तैयार हैं अपना फूड बिजनेस शुरू करने के लिए?”

      


    डी० पी० रावत,विशेष रिपोर्ट |

    भारत में छोटे उद्यमों और घरेलू स्तर पर फूड प्रोसेसिंग करने वालों के लिए केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PMFME) इन दिनों चर्चा का केंद्र बनी हुई है। “लोकल को वोकल” और “आत्मनिर्भर भारत” के विज़न को आगे बढ़ाते हुए यह योजना उन लाखों छोटे कारोबारियों के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर उभरी है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देख रहे हैं।

    📌 क्या है PMFME स्कीम?

    PMFME स्कीम का उद्देश्य देश के सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण (Micro Food Processing) उद्यमों को संगठित करना, तकनीकी सहायता देना और उन्हें बाजार से जोड़ना है। यह योजना मुख्य रूप से एक जिला एक उत्पाद (ODOP) मॉडल पर आधारित है, जिससे हर जिले की पहचान को मजबूत किया जा सके।

    सरकार का दावा है कि इस योजना के माध्यम से न केवल रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, बल्कि भारत के पारंपरिक खाद्य उत्पाद भी वैश्विक स्तर पर पहचान बना पाएंगे।

    🎯 योजना की मुख्य विशेषताएं

    PMFME योजना के तहत लाभार्थियों को कई तरह की सुविधाएं प्रदान की जाती हैं:

    💰 35% तक सब्सिडी:

    व्यक्तिगत उद्यमियों को अपने प्रोजेक्ट लागत पर 35% तक की सब्सिडी दी जाती है, जो अधिकतम 10 लाख रुपये तक हो सकती है।

    🏭 ब्रांडिंग और मार्केटिंग सपोर्ट:

    छोटे उत्पादकों को ब्रांडिंग, पैकेजिंग और मार्केटिंग में सहायता दी जाती है, जिससे उनके उत्पाद बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें।

    📚 ट्रेनिंग और स्किल डेवलपमेंट:

    उद्यमियों को आधुनिक तकनीकों और बिजनेस मैनेजमेंट की ट्रेनिंग दी जाती है।

    🤝 SHG और FPO को समर्थन:

    स्वयं सहायता समूह (SHG) और किसान उत्पादक संगठन (FPO) को भी इस योजना में विशेष प्राथमिकता दी जाती है।

    📊 क्यों ट्रेंड में है PMFME?

    हाल ही में कई राज्यों में इस योजना के तहत बड़ी संख्या में आवेदन आए हैं। खासकर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में ग्रामीण उद्यमियों ने इस योजना को तेजी से अपनाया है।

    हिमाचल के सेब, अचार, जैम और हर्बल उत्पाद अब ब्रांडिंग के साथ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर बेचे जा रहे हैं। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल रही है।

    🧑‍🌾 ग्राउंड रिपोर्ट: बदलती तस्वीर

    हिमाचल के एक छोटे गांव के निवासी रमेश कुमार, जो पहले घर पर अचार बनाकर सीमित मात्रा में बेचते थे, अब PMFME स्कीम की मदद से अपना छोटा फूड प्रोसेसिंग यूनिट चला रहे हैं।

    रमेश बताते हैं,

    “पहले हम सिर्फ लोकल बाजार तक सीमित थे, लेकिन अब हमारी पैकेजिंग और ब्रांडिंग बेहतर हुई है। ऑनलाइन ऑर्डर भी आने लगे हैं।”

    यह कहानी अकेले रमेश की नहीं है, बल्कि देशभर में हजारों छोटे उद्यमियों की है, जिनकी जिंदगी इस योजना से बदल रही है।

    ⚠️ चुनौतियां भी कम नहीं

    हालांकि PMFME स्कीम को लेकर उत्साह है, लेकिन कुछ चुनौतियां भी सामने आ रही हैं:

    📄 जटिल प्रक्रिया:

    कई ग्रामीण क्षेत्रों में आवेदन प्रक्रिया को लेकर जागरूकता की कमी है।

    🏦 बैंक लोन में देरी:

    सब्सिडी के बावजूद बैंक से लोन मिलने में देरी एक बड़ी समस्या बनी हुई है।

    📉 मार्केट कनेक्ट की कमी:

    कई उद्यमियों को अपने उत्पाद के लिए स्थायी बाजार नहीं मिल पा रहा है।

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इन चुनौतियों को समय रहते दूर किया जाए, तो यह योजना ग्रामीण अर्थव्यवस्था में क्रांति ला सकती है।

    🧠 विशेषज्ञों की राय

    आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, PMFME स्कीम भारत के MSME सेक्टर को नई दिशा देने में सक्षम है।

    वे कहते हैं,

    “अगर सही तरीके से क्रियान्वयन हो, तो यह योजना ‘स्टार्टअप इंडिया’ की तरह ही ग्रामीण क्षेत्रों में उद्यमिता की लहर पैदा कर सकती है।”

    🌍 ‘लोकल से ग्लोबल’ की ओर कदम

    PMFME स्कीम के तहत तैयार उत्पाद अब ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच रहे हैं। इससे भारत के पारंपरिक खाद्य उत्पादों को नई पहचान मिल रही है।

    सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले वर्षों में लाखों छोटे उद्यमियों को इस योजना से जोड़ा जाए और उन्हें आत्मनिर्भर बनाया जाए।

    📣 ABD न्यूज़ का विश्लेषण

    अखण्ड भारत दर्पण (ABD) न्यूज़ का मानना है कि PMFME स्कीम भारत के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के लिए “गेम चेंजर” साबित हो सकती है।

    लेकिन इसके लिए जरूरी है:

    योजना की जानकारी गांव-गांव तक पहुंचे

    आवेदन प्रक्रिया को सरल बनाया जाए

    बैंकिंग सिस्टम को अधिक पारदर्शी और तेज किया जाए

    🔚 निष्कर्ष

    PMFME स्कीम सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि लाखों सपनों को साकार करने का माध्यम बनती जा रही है।

    “रसोई से उद्योग तक” का यह सफर भारत को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक मजबूत कदम है।

    अब सवाल यह है—

    क्या देश का हर छोटा उद्यमी इस मौके का फायदा उठाकर अपने सपनों को उड़ान देगा?