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    Friday, July 12, 2024

    25 Years Of Kargil: पिता ने वापस भेज दी थी शहीद बेटे की चिता की राख, अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था हस्तक्षेप

     25 Years Of Kargil: पिता ने वापस भेज दी थी शहीद बेटे की चिता की राख, अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था हस्तक्षेप



    खुमताई में जिंटू के अंतिम संस्कार के बाद, उनके पिता ने अपने बेटे की राख का एक हिस्सा युद्ध के मैदान में वापस भेज दिया। गोगोई चाहते थे कि इनके बेटे की राख को काला पत्थर पर बिखेर दिया जाए।
    करगिल युद्ध के 25वें विजय दिवस पर, राष्ट्र उन बहादुर सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान को याद कर रहा है, जिन्होंने 1999 में करगिल जंग के दौरान अपने अटूट बहादुरी का प्रदर्शन किया था। यह दिन हमारे देश की संप्रभुता की रक्षा के लिए उनकी बहादुरी और समर्पण की याद दिलाता है। साथ ही, उन परिवारों के लिए भी संवेदना व्यक्त करने का वक्त है, जिन्होंने जंग के दौरान अपने बच्चों और पिता के खोने का अपार दर्द सहा, फिर भी वे देश के लिए मजबूती से खड़े रहे। इन्हें में से एक थे असम के रहने वाले कैप्टन जिंटू गोगोई। जिन्होंने करगिल युद्ध के दौरान बटालिक में काला पत्थर पर पाकिस्तानी सेना से लड़ते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी। वहीं उनके लिए प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी व्यक्तिगत तौर पर हस्तक्षेप किया था। 

    दुश्मन के सामने नहीं किया सरेंडर


    29 जून 1999 की रात को कैप्टन जिंटू गोगोई को बटालिक सब-सेक्टर के जुबेर हिल क्षेत्र में नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पास काला पत्थर की रिज लाइन से दुश्मनों को खदेड़ने का काम सौंपा गया था। वे इस कार्रवाई में शहीद हो गए और उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया। असम के खुमताई गांव (गोलाघाट जिले) के रहने वाले उनके पिता मानद फ्लाइंग ऑफिसर थोगीराम गोगोई बताते हैं कि उन्हें अपने बेटे की मौत की खबर 2 जुलाई 1999 को मिली थी। जब जंग छिड़ने की खबर आई, तो कैप्टन जिंटू छुट्टी पर थे। उनकी 12 दिन पहले ही सगाई हुई थी। वे युद्ध शुरू होने से ठीक पहले उत्तरी कश्मीर के केरन सेक्टर में अपनी सेवाएं दे चुके थे, इसलिए उनकी बटालियन को दुश्मनों को खदेड़ने के लिए भेजा गया था। भारी गोलाबारी का सामना करने के बावजूद वे अपनी टीम के साथ सुबह-सुबह चोटी पर पहुंच गए। उन्हें तुरंत दुश्मनों ने घेर लिया। कैप्टन गोगोई को आत्मसमर्पण करने के लिए कहा गया, लेकिन अपनी रेजिमेंट के आदर्श वाक्य, "युद्धया कृत निश्चय (दृढ़ संकल्प के साथ लड़ो)" को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपने रेजिमेंटल युद्ध के नारे, "बद्री विशाल लाल की जय (भगवान बद्री नाथ के पुत्रों की विजय)" के साथ दुश्मन सैनिकों पर धावा बोल दिया। उन्होंने सर्वोच्च बलिदान देने से पहले दुश्मन पर गोलियां चलाईं और दो पाकिस्तानी सैनिकों को ढेर कर दिया। उनके वीर चक्र प्रशस्ति पत्र में लिखा है, "कैप्टन जिंटू गोगोई ने सबसे दुर्गम इलाके में दुश्मन का सामना करते हुए बहादुरी का सबसे विशिष्ट कार्य, कर्तव्य के प्रति अद्वितीय समर्पण और असाधारण स्तर का नेतृत्व प्रदर्शित किया और भारतीय सेना की सर्वोच्च परंपरा में सर्वोच्च बलिदान दिया।"

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