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सम्पादकीय: क्या मानवाधिकार आयोग रामपुर बुशैहर में मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति के सतलुज नदी में डूब कर मरने की घटना पर स्वत: संज्ञान लेगा?

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  रामपुर बुशैहर में मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति सतलुज नदी में छलांग लगाकर कर मौत और जिंदगी के बीच क़रीब एक - डेढ़ घंटा जूझता रहा।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स लाइव प्रसारण करते रहे....

तथाकथित बुद्धिजीवी और आम जनता मूक दर्शक बनी रही....

पुलिस ने कुछ प्रयास उसके बचाव में किए..... अंततः वह व्यक्ति अपनी जान गंवा बैठा....!

यदि वह व्यक्ति कोई VIP या रसूखदार या किसी नेता या मंत्री का परिवार का सदस्य होता..... उसे बचाने प्रशासन, NDRF या SDRF टीम तुरन्त मौके पर पहुंच कर हर सम्भव कोशिश उसे बचाने की करती। 

अगर ज़रूरत पड़ती हो सकता वायु सेना या मुख्यमंत्री का हेलिकॉप्टर भी उतर जाता ....

ऐसा इसी लिए लिखा गया है.... क्योंकि पूर्व भाजपा की जयराम सरकार में बिलासपुर से एक मंत्री की पोती को हेलीकॉप्टर से एयरलिफ्ट किया गया था।

वह तो आम आदमी था .... वह भी नेपाली.... उसे बचाने के लिए इतनी जद्दोजहद क्यों भला?


यदि मंशा आम आदमी को बचाने की होती तो 

प्रशासन NDRF या SDRF को तुरन्त तैनात कर सकती थी।

हां, एक बात ज़रूर है कि NDRF की टीम ने उसेके शव को निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

मगर वह बदकिस्मत आम आदमी था,भला उसकी फिक्र किसको ? पूरा शासन प्रशासन ज़िला स्तरीय फाग मेले में व्यस्त था।

जी हां, उस व्यक्ति को बचाया जा सकता था।

यदि NDRF की टीम घटना अवधि में पहुंचकर उसे ज़िन्दा बचा लेती और उसे मानसिक रोगी देखभाल एवम् पुनर्वास केन्द्र में दाखिल करती तो मानवता की जीत अवश्य होती....!

यहां तो मानवीय मूल्यों की हार हुई है।

अगर इसे प्रशासन एवम् तथाकथित बुद्धिजीवियों की लापरवाही कहें तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

क्या मानवीय मूल्यों का मुख्य संरक्षक - मानवाधिकार आयोग 

इस घटना पर प्रशासन के खिलाफ़ स्वत: संज्ञान लेगा?


क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन की रक्षा का मौलिक अधिकार है।जीवन की रक्षा के अधिकार के तहत राज्य नागरिकों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है। इस अवधारण के कार्यान्वयन का वैधानिक कर्तव्य स्थानीय प्रशासन का है।

  पत्रकार डी० पी० रावत (सम्पादक)की कलम से।



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