अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय इकाई ने बुधवार को विधि विभाग के सेमिनार हॉल में भगवान बिरसा मुंडा की जयंती पर संगोष्ठी आयोजित की। विद्यार्थी परिषद द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के तौर पर विकास गुप्ता ( उपाध्यक्ष हिमगिरी कल्याण आश्रम ) एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ संजय शर्मा उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में उपस्थित कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए डॉ संजय शर्मा ने कहा कि बिरसा मुंडा देश की थाती हैं। उन्होंने भारतीय मानस को बदलने और उनमें सामाजिक चेतना जागृत करने का प्रयास किया है। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ कई विद्रोह करके अंग्रेजी हुकूमत को हिला कर रख दिया था। उन्होंने अत्याचारों से जनजाति समाज की रक्षा की, सनातन धर्म की अस्मिता, संस्कृति को विलुप्त होने से बचाने के लिए उन्होंने ईश्वरीय दूत बनकर काम किया। बिरसा की जीवन पद्धति संघर्षशील जीवन पद्धति थी।उन्होंने सत्य को उद्घाटित करने का प्रयास किया है और शोषण के खिलाफ विद्रोह किया।
राष्ट्र और धर्म रक्षा में जनजाति महानायकों का योगदान अहम
कार्यकर्ताओं को सम्बोधित करते हुए मुख्य अतिथि ने कहा कि बिरसा मुंडा एक आदिवासी नेता और लोकनायक थे। वर्तमान भारत में रांची और सिंहभूमि के आदिवासी बिरसा मुंडा को अब 'बिरसा भगवान' कहकर याद करते हैं। मुंडा आदिवासियों को अंग्रेज़ों के दमन के विरुद्ध खड़ा करके बिरसा मुंडा ने यह सम्मान अर्जित किया था। 19वीं सदी में बिरसा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक मुख्य कड़ी साबित हुए थे।उन्होंने बताया कि कहा जाता है कि 1895 में कुछ ऐसी आलौकिक घटनाएँ घटीं, जिनके कारण लोग बिरसा को भगवान का अवतार मानने लगे।
लोगों में यह विश्वास दृढ़ हो गया कि बिरसा के स्पर्श मात्र से ही रोग दूर हो जाते हैं। अक्टूबर 1894 को नौजवान नेता के रूप में सभी मुंडाओं को एकत्र कर इन्होंने अंग्रेजो से लगान माफी के लिए आन्दोलन किया। 1895 में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और हजारीबाग केन्द्रीय कारागार में दो साल के कारावास की सजा दी गई । लेकिन बिरसा और उसके शिष्यों ने क्षेत्र की अकाल पीड़ित जनता की सहायता करने की ठान रखी थी और अपने जीवन काल में ही एक महापुरुष का दर्जा पाया।
उन्हें उस इलाके के लोगों द्वारा "धरती बाबा" के नाम से पुकारा और पूजा जाता था। उनके प्रभाव की वृद्धि के बाद पूरे इलाके के मुंडाओं में संगठित होने की चेतना जागी।बिरसा ने अपनी अन्तिम सांस 9 जून 1900 को राँची कारागार में लीं थी । आज भी बिहार, उड़ीसा, झारखंड, छत्तीसगढ और पश्चिम बंगाल के आदिवासी इलाकों में बिरसा मुण्डा को भगवान की तरह पूजा जाता है।
मुख्य वक्ताओं के सम्बोधन के उपरांत शिक्षा, समाज सेवा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाले विश्वविद्यालय के छात्र छात्राओं को मुख्य अतिथि द्वारा सम्मानित किया गया।कार्यक्रम के अंत में इकाई सह मंत्री सुनील द्वारा संगोष्ठी में उपस्थित कार्यकर्ताओं को धन्यवाद व्यक्त किया गया।
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