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सम्पादकीय: युवा संस्कार बनाम भविष्य के गर्त में

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डी० पी० रावत

सम्पादक, अखण्ड भारत दर्पण (ABD) न्यूज़भारत युवाओं का देश कहलाता है। आज़ादी के बाद से अब तक यदि किसी वर्ग से सबसे अधिक अपेक्षाएँ की गई हैं, तो वह युवा वर्ग ही है। परन्तु आज का सबसे बड़ा और चिंताजनक प्रश्न यह है कि क्या हमारा युवा सही संस्कारों की दिशा में आगे बढ़ रहा है या फिर धीरे-धीरे भविष्य के गर्त की ओर धकेला जा रहा है?

आधुनिकता, तकनीक और सोशल मीडिया ने युवाओं के जीवन को जितना सरल बनाया है, उतना ही जटिल भी। मोबाइल फ़ोन, रील संस्कृति और आभासी दुनिया ने वास्तविक जीवन के मूल्यों को पीछे छोड़ दिया है। आज का युवा रातों-रात प्रसिद्धि, आसान पैसा और बिना परिश्रम सफलता की चाह में भटक रहा है। परिणामस्वरूप अनुशासन, संयम, परिश्रम और नैतिकता जैसे संस्कार कमजोर पड़ते जा रहे हैं।

संस्कार केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं होते, बल्कि जीवन जीने की सही पद्धति हैं। माता-पिता का सम्मान, गुरु के प्रति आदर, समाज के प्रति उत्तरदायित्व और राष्ट्र के प्रति कर्तव्य—ये सब संस्कारों की नींव हैं। दुर्भाग्यवश आज कई परिवारों में समय की कमी, संवाद की कमी और जिम्मेदारियों से बचने की प्रवृत्ति ने बच्चों को सही मार्गदर्शन से वंचित कर दिया है।

शिक्षा व्यवस्था भी इस संकट से अछूती नहीं है। अंक और डिग्री की दौड़ में नैतिक शिक्षा, चरित्र निर्माण और जीवन मूल्यों को हाशिये पर डाल दिया गया है। जब शिक्षा केवल रोज़गार का साधन बनकर रह जाए और इंसान बनाने का उद्देश्य खो दे, तब समाज को परिणाम भुगतने ही पड़ते हैं—नशा, अपराध, अवसाद और आत्महत्या जैसी समस्याएँ उसी की उपज हैं।

युवा यदि भटकता है तो दोष केवल उसी का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है। राजनैतिक स्वार्थ, बेरोज़गारी, दिशाहीन विकास और आदर्श नेतृत्व का अभाव भी युवाओं को निराशा की ओर ले जा रहा है। जब मेहनत के बावजूद अवसर न मिलें, तब युवा गलत रास्तों की ओर आकर्षित हो जाता है।

आज आवश्यकता है आत्ममंथन की। परिवार, विद्यालय, समाज और शासन—सभी को मिलकर युवाओं के लिए एक सकारात्मक वातावरण तैयार करना होगा। खेल, संस्कृति, सेवा और सृजनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देना होगा। युवाओं को केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माता के रूप में देखना होगा।

यदि आज हमने संस्कारों की लौ को फिर से प्रज्वलित नहीं किया, तो आने वाला कल अंधकारमय हो सकता है। युवा शक्ति यदि सही दिशा में लग जाए, तो वही देश को शिखर पर पहुँचा सकती है; और यदि उपेक्षित रही, तो भविष्य का गर्त दूर नहीं।

यही आज का सत्य है और यही हमारी सबसे बड़ी चेतावनी भी।

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