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क्या बागीपुल और समेज़ में बादल फटने की घटना एक प्राकृतिक आपदा है या देव प्रकोप?

Shri khand mahadev yatra2024,






डी.पी.रावत।

8 अगस्त,निरमण्ड/कुल्लू।


हिमाचल प्रदेश के कुल्लू ज़िला के सूदूर उप मण्डल निरमण्ड के अंतर्गत 31 जुलाई की रात   बागीपुल और समेज़ में बादल फटने की भयानक घटना हुई है। जिसमें जान माल का भारी नुकसान हुआ है। इस घटना में कई लोग लापता और कई लोगों के पूरे परिवार को जान से हाथ धोना पड़ा है;कई पुल,वाहन,सरकारी व निजी भवन के बहने के साथ साथ कई मवेशी और गौशालाएं जमीदोज़ हुए हैं।


कबीले गौर है कि देश भर में कठिनतम धार्मिक यात्राओं में से एक श्री खण्ड महादेव यात्रा 2024 आधिकारिक तौर पर 27 जुलाई को खत्म हो गई है।

उसके बाद 29 अगस्त को तहसील निरमण्ड कोठी ढौल फाटी बाड़ी के डमैड़ी गांव के प्रमुख देवता नगेला अपने 238 देवलुओं संग 65 वर्षों के अंतराल बाद श्रीखण्ड महादेव यात्रा पर निकले ।

बताया जा रहा है कि उक्त देवता अपने लाव लश्कर के साथ 31 जुलाई को भीम डवारी में रात्रि विश्राम कर रहे थे; तभी रात को उक्त देवलुओं को चारों ओर पहाड़ टूटने और धंसने की भयंकर आवाजें सुनाई दी। वे काफ़ी भयभीत हो गए थे। उसके बाद सभी देवलुओंं ने वहीं पूजा अर्चना कर वापिस सुरक्षित घर पहुंचे।


बताया जा रहा है कि भीम डवारी के समीप बादल फटने से श्री खण्ड महादेव पर्वत श्रृंखला के दाईं तरफ से निकलने वाली कुर्पण खड्ड(बारह मासी जलधारा) में बाढ़ आने से बागीपुल और केदस गांव में जान माल की भारी क्षति हुई है। जबकि बाईं तरफ से बादल फटने से उत्पन्न जल धारा ने समेज़ गांव को तहस नहस कर दिया है।

कुछ जानकारों का मानना है कि 

श्री खण्ड महादेव की विपरीत दिशा में भी बादल फटने से मलाणा खड्ड में भी बाढ़ आने से भारी क्षति हुई है।


निरमण्ड क्षेत्र के आसपास के हर गली मुहल्लों में तथा विभिन्न सोशल मीडिया प्लेट फार्म पर इस बादल फटने की घटना के कारणों पर एक बहस छिड़ी हुई है। कुछ बुद्धिजीवियों का तर्क है कि यह घटना श्री खण्ड महादेव घाटी में गंदगी फैलाने देव नियमों के उल्लंघन होने पर भगवान भोले नाथ शिव शंकर,देवी चैल ए चलानी और नगेला देवता के प्रकोप के कारण हुई है। उन्होंने तर्क दिया है कि इस यात्रा को भविष्य में बन्द किया जाना चाहिए।

जबकि दूसरी तरफ कुछ वैज्ञानिक सोच वाले तर्कवादी बुद्धिजीवियों का कहना है कि यह घटना ग्लोबल वार्मिग,पेड़ पौधों के अंधाधुंध कटान, पहाड़ों को खोदकर सुरंगों के निर्माण और पर्यावरण असंतुलन के कारण हुई है।

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