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जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एलआईसी पर लगाया 50 लाख का जुर्माना, 30 दिन में भुगतान के दिए आदेश

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जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने एलआईसी पर लगाया 50 लाख का जुर्माना, 30 दिन में भुगतान के दिए आदेश


केरल के कोट्टायम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने हाल ही में भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें बीमा कंपनी को 50 लाख रुपये का जुर्माना अदा करने का आदेश दिया गया है। इस फैसले के अनुसार, एलआईसी को यह जुर्माना 30 दिनों के भीतर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करना होगा। यह फैसला एक प्रवासी भारतीय जेमन की मौत के बाद उनके परिवार द्वारा दायर की गई शिकायत के आधार पर आया है।

मामला: एलआईसी की लापरवाही और उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन

इस पूरे मामले की शुरुआत जनवरी 2020 में हुई, जब जेमन ने लंदन से भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) की "जीवन उमंग" पॉलिसी के लिए 20.72 लाख रुपये का प्रीमियम जमा किया। जेमन ने सभी आवश्यक चिकित्सा परीक्षणों का अनुपालन किया और पॉलिसी के लिए आवेदन किया। हालांकि, एलआईसी ने अनिवासी भारतीयों के लिए पॉलिसियों के अस्थायी निलंबन का हवाला देते हुए जेमन के आवेदन को रोक दिया। यह निलंबन COVID-19 महामारी के जवाब में लागू किया गया था, जो कि उस समय पूरी दुनिया में फैला हुआ था।

दुर्भाग्यवश, COVID-19 महामारी के दौरान जेमन की लंदन में मृत्यु हो गई। जेमन के बाद उनकी पत्नी और बेटी को बीमा का लाभ मिलना था, लेकिन एलआईसी ने पॉलिसी के लिए अनुबंध की अनुपस्थिति का हवाला देते हुए उनके परिवार के दावे को खारिज कर दिया। इसके बावजूद, एलआईसी ने जनवरी 2021 में जमा किया गया प्रीमियम वापस कर दिया, लेकिन बीमा पॉलिसी से संबंधित कोई लाभ नहीं दिया।

उपभोक्ता आयोग का फैसला और जांच

जेमन की पत्नी और बेटी ने एलआईसी के इस निर्णय के खिलाफ जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग में शिकायत दर्ज कराई। आयोग ने शिकायत की गंभीरता को देखते हुए गहराई से जांच की और पाया कि जेमन के परिवार को अनुबंध की अनुपस्थिति के कारण बीमा कवरेज का लाभ नहीं मिल पाया।

हालांकि, आयोग ने यह भी पाया कि एलआईसी ने अपने ही दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया था। एलआईसी के दिशा-निर्देशों के अनुसार, पॉलिसी आवेदनों पर कार्रवाई की जानी चाहिए और आवेदकों को 15 दिनों के भीतर निर्णय के बारे में सूचित किया जाना चाहिए था। लेकिन इस मामले में, एलआईसी ने इस प्रक्रिया का पालन नहीं किया, जिससे जेमन के परिवार को न्याय पाने में कठिनाई हुई।

आयोग ने अपने फैसले में यह भी कहा कि जेमन के परिवार को इस लापरवाही का सामना करना पड़ा, जिसका उन्हें कोई कानूनी सहारा नहीं मिल सका। आयोग ने एलआईसी के इस कार्य को उपभोक्ता अधिकारों का गंभीर उल्लंघन माना और इसके लिए 50 लाख रुपये का जुर्माना लगाया। साथ ही, यह आदेश दिया कि यह राशि 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ 30 दिनों के भीतर जेमन के परिवार को दी जाए।

कानूनी दृष्टिकोण: अनुबंध की अनुपस्थिति और उपभोक्ता अधिकार

यह मामला उन जटिलताओं को उजागर करता है जो बीमा उद्योग में उपभोक्ताओं को अक्सर सामना करना पड़ता है। बीमा कंपनियों द्वारा अक्सर अनुबंध की अनुपस्थिति का हवाला देकर उपभोक्ताओं के दावों को खारिज कर दिया जाता है। लेकिन इस मामले में, उपभोक्ता आयोग ने यह स्पष्ट कर दिया कि अनुबंध की अनुपस्थिति के बावजूद, बीमा कंपनियों को उनके दिशा-निर्देशों और उपभोक्ता अधिकारों का पालन करना आवश्यक है।

इस फैसले से यह भी साबित होता है कि बीमा कंपनियां अपने अनुबंधों की प्रक्रिया में लापरवाही बरतती हैं, जिससे उपभोक्ताओं को भारी नुकसान होता है। आयोग ने यह भी संकेत दिया कि यदि एलआईसी ने समय पर जेमन के पॉलिसी आवेदन पर कार्रवाई की होती, तो यह स्थिति नहीं उत्पन्न होती और जेमन का परिवार इस आर्थिक संकट से बच सकता था।

जेमन के परिवार की स्थिति और प्रतिक्रिया

जेमन की मृत्यु के बाद, उनकी पत्नी और बेटी ने एक कठिन दौर का सामना किया। जेमन परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था, और उसकी मृत्यु के बाद परिवार के सामने आर्थिक संकट पैदा हो गया। एलआईसी के द्वारा बीमा लाभ को नकारने के बाद, जेमन की पत्नी ने न्याय के लिए लड़ाई शुरू की।

इस फैसले के बाद, जेमन की पत्नी ने कहा, "यह एक लंबी और कठिन लड़ाई थी, लेकिन हमें न्याय मिला। यह फैसला न केवल हमारे लिए, बल्कि उन सभी लोगों के लिए है जो बीमा कंपनियों के अन्याय का सामना कर रहे हैं।" उन्होंने यह भी कहा कि यह फैसला उनके परिवार के लिए आर्थिक सहायता के साथ-साथ मानसिक संतोष भी लाया है।

समाज पर प्रभाव: उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा

यह फैसला समाज में उपभोक्ता अधिकारों की सुरक्षा के प्रति एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। बीमा कंपनियों द्वारा उपभोक्ताओं के अधिकारों का उल्लंघन अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह मामला उन सभी उपभोक्ताओं के लिए एक प्रेरणा है जो अपनी बीमा कंपनियों के खिलाफ न्याय पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

यह निर्णय यह भी सुनिश्चित करता है कि बीमा कंपनियों को अपने दिशा-निर्देशों और अनुबंधों का पालन करना आवश्यक है, और यदि वे ऐसा नहीं करते, तो उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। उपभोक्ता आयोग का यह फैसला यह सुनिश्चित करता है कि उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों का उचित सम्मान मिलना चाहिए, और बीमा कंपनियों को उनके साथ निष्पक्ष और न्यायपूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

परिवार को न्याय 

केरल के कोट्टायम जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग का यह फैसला उपभोक्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण जीत है। यह न केवल जेमन के परिवार को न्याय दिलाने का काम करता है, बल्कि बीमा उद्योग में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी है। इस मामले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, और यदि कोई बीमा कंपनी अपने कर्तव्यों का पालन नहीं करती, तो उसे कानूनी रूप से जवाबदेह ठहराया जाएगा।




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