जिला चंबा के भटियात क्षेत्र के बकलोह में रहने वाले गोरखा समुदाय के लोगों ने भाई-दूज का पर्व पारंपरिक रीति-रिवाजों और हर्षोल्लास के साथ मनाया। यह पर्व भाई-बहन के अटूट प्रेम और स्नेह का प्रतीक है, जिसे गोरखा समाज अपनी विशेष परंपरा के साथ हर वर्ष बड़े उत्साह से मनाता है।
इस पर्व के लिए बहनें एक सप्ताह पहले ही अपने भाइयों को भाई-दूज के टीका का न्योता भेजती हैं। चाहे भाई देश या प्रदेश के किसी भी कोने में हों, वे इस दिन अपनी बहनों के पास पहुंचने का भरसक प्रयास करते हैं। बहनें भी एक महीने पहले से ही तैयारियों में जुट जाती हैं।
त्योहार के दिन सुबह-सुबह बहनें देवी-देवताओं की पूजा के बाद भाइयों की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना करती हैं। इसके बाद वे विशेष प्रकार का तिलक तैयार करती हैं — सबसे पहले माथे पर सफेद लंबा तिलक लगाकर उसके ऊपर लाल, नीले और पीले तीन रंगों का तिलक लगाया जाता है, जो सौभाग्य, समृद्धि और शक्ति का प्रतीक है। इसके बाद गेंदे के फूलों की माला पहनाकर आरती उतारी जाती है।
भाई-दूज पर बहनों द्वारा सेल रोटी, फिनी, गुजिया, आलू की चटनी सहित शाकाहारी और मांसाहारी व्यंजन बड़े स्नेह से परोसे जाते हैं। बदले में भाई अपनी बहनों को उपहार और आशीर्वाद देते हैं।
दिनभर गीत-संगीत और नाच-गाने के माहौल से पूरा वातावरण आनंदमय बना रहता है। शाम ढलने तक सभी परिवारजन आपसी प्रेम और अपनत्व का संदेश देते हुए अपने-अपने घरों को लौट जाते हैं।
भाई-बहन के पवित्र बंधन का यह पर्व बकलोह की गोरखा संस्कृति की समृद्ध परंपरा और सामाजिक एकता का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है।


