भारत वह भूमि है जहाँ स्वामी विवेकानंद जैसे महान् विचारक और युवा प्रेरणास्रोत ने जन्म लिया। 11 सितंबर 1893 को शिकागो में विश्व धर्म संसद में दिए गए उनके ऐतिहासिक भाषण ने सनातन मूल्यों, हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता को वैश्विक मंच पर स्थापित किया।
विडंबना यह है कि उसी भारत में आज का युवा तेजी से तनाव, अवसाद, क्रोध, चिड़चिड़ापन और निराशा जैसी मानसिक समस्याओं से जूझ रहा है। नशे की प्रवृत्ति और आत्महत्या जैसे गंभीर कदम समाज के लिए चिंता का विषय बनते जा रहे हैं।
युवाओं में बढ़ते मानसिक संकट के प्रमुख कारण
डॉ. प्रकाश आचार्य के अनुसार युवाओं में मानसिक और शारीरिक कमजोरी के पीछे कई कारण हैं।सबसे बड़ा कारण बच्चों की रुचि, क्षमता, योग्यता, मानसिक स्तर और प्रवृत्तियों के अनुरूप शिक्षा व वातावरण का अभाव है।
इसके अलावा शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य की उपेक्षा, मानव जीवन के मूल्य का बोध न होना, पाठ्यक्रम की कमियां और अभिभावकों की लापरवाही भी गंभीर कारण हैं।
समाधान क्या हो सकता है?
डॉ. आचार्य मानते हैं कि अभिभावकों को बच्चों की क्षमताओं की गहन समझ विकसित कर उनके अनुरूप अपेक्षाएं, अवसर और शैक्षिक वातावरण उपलब्ध कराना चाहिए।
शिक्षा व्यवस्था को भी केवल रोजगार तक सीमित न रहकर आत्मबोध, जीवन लक्ष्य, मानसिक सशक्तिकरण, नैतिक मूल्यों और भारतीय संस्कृति के संरक्षण पर केंद्रित होना होगा।
पाठ्यक्रम में ऐसे विषय शामिल किए जाने चाहिए जो बच्चों के पंचकोशीय और समग्र विकास को सुनिश्चित करें। शिक्षकों को विषय विशेषज्ञ होने के साथ-साथ शिक्षा दर्शन, मनोविज्ञान और तंत्रिका विज्ञान का ज्ञान भी होना चाहिए।
शिक्षा का मूल आधार ‘मन’
डॉ. आचार्य का कहना है कि शिक्षा और शिक्षण का मूल आधार “मन” होना चाहिए, क्योंकि अधिकांश समस्याओं की जड़ वहीं से उत्पन्न होती है।
युवाओं के लिए संदेश
उन्होंने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि विचारों और कर्मों को सही दिशा देने की प्रक्रिया है। जीवन में जोखिम उठाना जरूरी है—जीत नेतृत्व सिखाती है और हार अनुभव।
स्वामी विवेकानंद जयंती पर उन्होंने युवाओं से सत्य, न्याय, अहिंसा और नैतिकता को जीवन में उतारने का आह्वान किया।

