(मुम्बई से रुक्मिणी की कलम से)
मुंबई के संतोष नगर में रहने वाली रुक्मिणी अपने दिलेर पापा की इकलौती बेटी है।पापा पारो शैवलिनी पश्चिम बंगाल के चित्तरंजन में रहते हैं।वहीं रुक्मिणी का विवाह मनीष शर्मा के साथ हुआ था।पापा मिहिजाम के एक प्राईवेट स्कूल के प्राचार्य थे। मात्र पाँच रूपये मासिक मानदेय पर जीवन यापन करते थे। वहीं से पापा के जीवन में एक नयी मोड़ आई।उन्होंने आसनसोल के एक साप्ताहिक अखबार बंग एक्सप्रेस में बतौर सहायक संपादक का काम मिला,मात्र पन्द्रह सौ मासिक मानदेय पर। पापा की दिलेरी और लड़ाकू छवि ने मुझे भी पत्रकार बनने के लिए प्रेरित किया।मगर,शादी के बाद एक नयी जिम्मेदारी से बंध गई। मुंबई के मलाड वन विभाग के पहाड़ी इलाके से नयी शुरुआत करते हुए संतोष नगर के फ्लैट तक आई। दो बच्चों अभिषेक और आशीष के भविष्य को बुनने में लगी हूँ। मगर,विदाई के समय पापा और मम्मी ने जो वचन दिया उसे पुरी जिम्मेदारी से निभा रही हूँ। एक रोज बोरीवली वेस्ट में मनसुख दादा के ठेले से कुछ खरीदते समय उनकी बातें सुनकर मन और दिल दोनों भर आये। कोविड के दौरान हजारों-हजार लोगों की नौकरी चली गई थी।मगर परिवार की जिम्मेदारी ने मनसुख चाचा के इरादे और हौसले को और मजबूत कर दिया।आगे बढ़े और बढ़ते रहे।आज उनका बेटा अच्छी नौकरी करता है।मगर,रोज ठेला लगाना नहीं भूलते। दिल की बात कहती हूँ,मनसुख चाचा के ठेले पर केवल सामान नहीं उम्मीद और प्रेरणा के मीठे फल भी मिलते हैं।सलाम करती हूँ उनके हौसले और संघर्ष को।आमीन।
(सत्य घटना पर आधारित कहानी)
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