डी पी रावत
मुख्य संपादक
अखण्ड भारत दर्पण न्यूज
(विशेष आलेख)
सोशल मीडिया पर प्रसारित समाचारों के अनुसार, वर्ष 2025–26 के दिसंबर माह में बीते 32 वर्षों में सबसे कम वर्षा दर्ज की गई है। लंबे समय तक बारिश न होने से आमजन की आशा भरी निगाहें आसमान की ओर टिकी रहीं, लेकिन बादल आते-जाते रहे और उम्मीदें निराशा में बदलती चली गईं।
वहीं दूसरी ओर, बरसात के मौसम में इसी वर्ष ने कई वर्षों के भारी वर्षा के रिकॉर्ड तोड़ दिए, जिससे बाढ़, भूस्खलन और जन-धन की हानि जैसी समस्याएं सामने आईं। इसके साथ ही हाल के दिनों में जंगली जानवरों का दिनदहाड़े शहरों और गांवों में घूमते नजर आना भी चिंता का विषय बनता जा रहा है।
इन घटनाओं ने एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है—आखिर इस प्रकृति असंतुलन के लिए जिम्मेदार कौन है?
इस विषय पर विचार व्यक्त करते हुए डॉ. प्रकाश आचार्य का कहना है कि यदि गहराई से देखा जाए, तो इसका सबसे बड़ा कारण मनुष्य स्वयं है। सृष्टि के पांच मूल तत्व—धरती, जल, वायु, वनस्पति और जीव-जंतु—अपने-अपने प्राकृतिक नियमों और धर्म का पालन कर रहे हैं। लेकिन बुद्धि में सर्वश्रेष्ठ होने के बावजूद मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो प्रकृति के नियमों का पालन करने के बजाय उनका उल्लंघन कर रहा है।
डॉ. आचार्य के अनुसार, जहां मनुष्य का धर्म प्रकृति के संरक्षण का है, वहीं आज वह संरक्षण के स्थान पर भक्षण कर रहा है। वनस्पतियां जो मानव जीवन का आधार हैं, उन्हें काटकर नष्ट किया जा रहा है। इसी तरह जीव-जंतुओं के प्राकृतिक आवास उजाड़े जा रहे हैं, जिससे वे भोजन और आश्रय की तलाश में मानव बस्तियों की ओर आने को मजबूर हैं।
उन्होंने कहा कि व्यक्तिगत स्वार्थ और असीमित उपभोग की प्रवृत्ति ने प्रकृति के संतुलन को गहराई से प्रभावित किया है, जिसके दुष्परिणाम आज जलवायु परिवर्तन, अनियमित वर्षा, प्राकृतिक आपदाओं और जैव विविधता के संकट के रूप में सामने आ रहे हैं।
डॉ. प्रकाश आचार्य का मानना है कि यदि मनुष्य अपनी संस्कृति, आध्यात्म और धर्म के मूल सिद्धांतों का पालन करे, तो प्रकृति के साथ संतुलन पुनः स्थापित किया जा सकता है और आने वाली पीढ़ियों को प्राकृतिक आपदाओं से काफी हद तक बचाया जा सकता है।
