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डेटा प्रोटेक्शन क़ानून पर बवाल… पत्रकार बोले – सच लिखने पर सहमति कौन देगा?

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डी०पी० रावत पत्रकार अखण्ड भारत दर्पण (ABD) न्यूज़ 

निजता की सुरक्षा के नाम पर लाए गए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट को लेकर देशभर में बहस तेज़ है। सरकार कह रही है – पत्रकारिता पर इसका असर नहीं होगा, लेकिन पत्रकार संगठनों का कहना है कि कानून में बदलाव ज़रूरी है, वरना खोजी रिपोर्टिंग पर ताले लग सकते हैं।


📍 क्यों हो रहा विरोध


2023 में पारित इस कानून के तहत किसी भी व्यक्ति का निजी डेटा लेने से पहले उसकी सहमति ज़रूरी है।


निजी डेटा में नाम, पता, फ़ोन नंबर, वित्तीय जानकारी, तस्वीर और इंटरनेट ब्राउज़िंग हिस्ट्री शामिल है।


उल्लंघन पर 250 से 500 करोड़ रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।


पत्रकारों का तर्क – कई बार ख़बरों में ऐसे निजी डेटा का उल्लेख ज़रूरी होता है, खासकर भ्रष्टाचार या अपराध से जुड़ी रिपोर्ट में।



📍 पत्रकारों की आशंका


सरकार कुछ परिस्थितियों में किसी का डेटा साझा करने का आदेश दे सकती है, जिससे गुप्त सूत्रों की पहचान उजागर होने का डर है।


2018 की जस्टिस बी. एन. श्रीकृष्ण कमेटी भी कह चुकी है – अगर पत्रकारों को पूरी तरह इस कानून का पालन करना पड़ा, तो कोई भी अपने खिलाफ रिपोर्ट के लिए सहमति नहीं देगा।



📍 सरकार का रुख


28 जुलाई को इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय के सचिव ने प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया की उपाध्यक्ष संगीता बरुआ पिशारोती से मुलाक़ात में कहा – पत्रकारों को इस कानून से कोई मुश्किल नहीं होगी।

📍 पत्रकारों की मांग

कानून में पत्रकारिता को स्पष्ट छूट मिले।

'पत्रकार' की परिभाषा सिर्फ मीडिया संस्थानों तक सीमित न हो।

"अगर हर खबर के लिए सहमति लेनी पड़ी… तो भ्रष्टाचार की फाइलें कभी खुल ही नहीं पाएंगी"

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