सहमति से सेक्स की उम्र पर देश में मचा घमासान, सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े पर पहुंची बहस - अखण्ड भारत दर्पण (ABD) न्यूज़

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    Friday, August 1, 2025

    सहमति से सेक्स की उम्र पर देश में मचा घमासान, सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े पर पहुंची बहस

     


    भारत में सहमति से यौन संबंध बनाने की क़ानूनी उम्र को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी है कि 16 से 18 वर्ष के किशोरों के बीच सहमति से बने यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे संबंध न शोषण हैं और न ही अत्याचार।


    जयसिंह का तर्क है कि उम्र आधारित कानूनों का उद्देश्य बच्चों को शोषण से बचाना होना चाहिए, न कि सहमति पर आधारित संबंधों को आपराधिक बना देना। उनका कहना है कि वर्तमान पॉक्सो कानून का दायरा इतना कठोर है कि वह किशोरों की स्वायत्तता को ही चुनौती दे देता है।


    हालांकि, केंद्र सरकार इस तर्क से सहमत नहीं है। सरकार का मानना है कि अगर इस तरह का अपवाद मान लिया जाए तो इससे बाल यौन शोषण, मानव तस्करी और बाल विवाह जैसी आपराधिक गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है।


    इसी बीच बाल अधिकार कार्यकर्ताओं और विशेषज्ञों में भी दो राय देखने को मिल रही है।

    जहां एक ओर कुछ कार्यकर्ता इस कानूनी उम्र को 16 साल करने की मांग कर रहे हैं, वहीं कई अन्य इसे समाज के लिए खतरनाक बताते हैं।


    अदालतों में भी मतभेद


    कर्नाटक हाईकोर्ट और मद्रास हाईकोर्ट जैसे कुछ उच्च न्यायालयों ने सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस का हवाला देते हुए न्यायिक विवेक के प्रयोग की बात कही है। यानी, जज मामलों के तथ्यों को देखकर फैसला लें।


    हालांकि इंदिरा जयसिंह का कहना है कि सिर्फ़ न्यायिक विवेक के भरोसे नहीं रहा जा सकता क्योंकि लंबे मुक़दमे की प्रक्रिया खुद में एक सज़ा बन जाती है।


    भारत में वर्तमान में सहमति की उम्र 18 साल है, जबकि यूरोप, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में यह 16 साल मानी जाती है। भारत में यह उम्र 1860 में 10 साल थी, जिसे 2012 में पॉक्सो क़ानून के तहत 18 वर्ष कर दिया गया।


    बाल अधिकार संगठनों की मांग


    बाल अधिकार संगठनों जैसे 'हक सेंटर फॉर चाइल्ड राइट्स' और 'एनफोल्ड ट्रस्ट' का मानना है कि समाज में बदलती सोच और किशोरों की यौन सक्रियता को ध्यान में रखते हुए कानूनों को लचीला बनाया जाना चाहिए।


    शर्मिला राजे जैसी कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई बार यह कानून जाति, वर्ग और धर्म के आधार पर गलत तरीके से लागू किए जाते हैं।


    वहीं वकील भुवन ऋभु का मानना है कि यदि अपवाद की इजाज़त दी गई तो इसका इस्तेमाल अपराधियों के बचाव में हो सकता है। वे न्यायिक प्रणाली में समयबद्ध सुनवाई और पीड़ित पुनर्वास प्रणाली में सुधार की भी मांग करते हैं।

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